अध्याय १७

नारदजी बोले – हे कृपा के सिन्धु! उसके बाद जागृत अवस्था को प्राप्त उस राजा दृढ़धन्वा का क्या हुआ? सो मुझसे कहिये जिसके सुनने से पापों का नाश कहा गया है ॥ १ ॥

नारायणजी बोले – अपने पूर्व जन्म के चरित्र को सुनने से आश्चर्ययुक्त तथा और सुनने की इच्छा रखनेवाले राजा दृढ़धन्वा से बाल्मीकि ऋषि फिर बोले ॥ २ ॥

बाल्मीकि मुनि बोले – इस तरह स्त्री के मुख से शीतल वाणी को सुनकर सुदेव शर्म्मा धैर्य धारण कर हरि भगवान्‌ में चित्त को लगाता हुआ ॥ ३ ॥

नारद उवाच ॥ ततः किमभवत्तस्य प्रबुद्धस्य महीपतेः ॥ तन्मे वद कृपासिन्धो श्रृण्वतां पापनाशनम्‌ ॥ १ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ स्वकीयचरित्रं श्रुत्वा प्राक्तनं चकिताननम्‌ ॥ राजानं पुनरेवाह बाल्मीकिः श्रवणोत्सुकम्‌ ॥ २ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ इति ताः शीतला वाचः समाकर्ण्य प्रियामुखात्‌ ॥ सुदेवो धैर्यमालम्ब्य हरौ चित्तमधारयत्‌ ॥ ३ ॥

निःश्वस्य दीनवदनो यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥ इति निश्चित्य मनमा पुष्पाद्यर्थं वनं ययौ ॥ ४ ॥

एवं कृतवतस्तस्य कियान्‌ कालो गतः क्रमात्‌ ॥ समित्कुशफलाद्यर्थं कदाचित्‌ काननं ययौ ॥ ५ ॥

सुदेवो मनसा ध्यायन्‌ हरेः पादसरोरुहम्‌ ॥ तस्मिन्नेकव दिने गच्छद्वापीं सूनुः सुहृद्‌वृतः ॥ ६ ॥

दीर्घ श्वाास लेकर दीनमुख सुदेव शर्म्मा, जो होनेवाला है वह होगा यह मन में निश्च य कर पुष्प समिधा आदि के लिये वन को गया ॥ ४ ॥

इस प्रकार करते उस सुदेवशर्म्मा का कितना ही समय बीत गया। बाद किसी दिन समिधा, कुश, फल, पुष्प आदि के लेने के लिये वन को गया ॥ ५ ॥

वहाँ जाकर सुदेवशर्म्मा मन से हरि भगवान्‌ के चरणकमलों का ध्यान करने लगा। उसी दिन उसका लड़का शुकदेव अपने मित्रों के साथ बावली को गया ॥ ६ ॥

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