अध्याय १७

बावली में प्रवेश कर समवयस्क मित्रों के साथ जलयन्त्रों से जल फेंकता हुआ और बार-बार हँसता हुआ खेलने लगा ॥ ७ ॥

गर्मी के ऋतु में बार-बार जल में खेलता हुआ हर्ष को प्राप्त हुआ। इस तरह प्रेम में मग्न सब बालकों से खेल करते हुए ॥ ८ ॥

अथाह जल में खड़ा हुआ वह शुकदेव बालक मित्र बालकों से पीड़ित होकर मित्र-वर्ग के भय से भागने की इच्छा करता हुआ ॥ ९ ॥

प्रविश्य वापीं चिक्रीडे वयस्यैः सह वारिणि ॥ जलयन्त्रैः क्षिपन्‌ वारि बालकेषु स्मयन्मुहुः ॥ ७ ॥

जले क्रीडां मुहुः कुर्वन्‌ ग्रीष्मे मोदमुपाययौ ॥ एवं सर्वेषु बालेषु क्रीडत्सु प्रेमनिर्भरम्‌ ॥ ८ ॥

अगाधसलिले तिष्ठन्‌ बालकैरुपमर्दितः ॥ स पलायनमन्विच्छन्‌ सुहृद्वर्गभयात्‌ द्रुतम्‌ ॥ ९ ॥

विधिना नोदितस्तत्र नियम्य श्वालसमात्मनः ॥ ममज्जगाधतोयेऽसौ वञ्चयन्नात्मनः सखीन्‌ ॥ १० ॥

तत्रापि व्याकुलीभूय ततो निर्गन्तुमुन्मनाः ॥ सहसा मृतिमापन्नः कुमारोऽगाधवारिणि ॥ ११ ॥

जलादनिर्गतं वीक्ष्य सर्वे चकितमानसाः ॥ समानवयसः सर्वे हाहा कृत्वा प्रधाविताः ॥ १२ ॥

और भाग्य से प्रेरित हो अपने श्वाँ॥स को रोक कर अपने मित्रों को छलने की इच्छा से वहाँ अथाह जल में गोता लगाया ॥ १० ॥

किन्तु उस जल में व्याकुल होकर उससे बाहर निकलने की इच्छा करता सहसा उस अथाह जल में वह बालक मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥ ११ ॥

जल से निकलते हुए बालक को न देखकर, वे सब समवयस्क मित्र बालक चकित होकर हाहाकार करते हुए बहुत जोर से दौड़े ॥ १२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7