अध्याय १७

और अत्यन्त शोक से ग्रस्त वे बालक उसकी माता गौतमी से जाकर बोले। उन बालकों के अत्यन्त अप्रिय वज्रपात के समान वचन को ॥ १३ ॥

सुनकर पुत्र में प्रेम करने वाली वह गौतमी तुरन्त पृथिवी पर गिर गई। उसी समय वन से सुदेवशर्म्मा आया ॥ १४ ॥

पुत्र का मरण सुनकर कटे वृक्ष के समान पृथिवी पर गिर गया। बाद दोनों ब्राह्मण स्त्री-पुरुष उठकर बावली को गये ॥ १५ ॥

गौतम्यै कथयामासुर्बृहच्छोकपरायणाः ॥ वज्रपातसमां वाचं बालानामनतिप्रियाम्‌ ॥ १३ ॥

श्रुत्वा भूमौ पपाताशु गौतमी पुत्रवत्सला ॥ एतस्मिन्नेिब समये वनाद्विप्रः समाययौ ॥ १४ ॥

निशम्य पुत्रमरणं त्वष्टेवावापतद्भुवि ॥ तत उत्थाय तौ विप्रदम्पती वापिकां गतौ ॥ १५ ॥

मृतं पुत्रं समालिङ्गय स्वाङ्क कृत्वा कलेवरम्‌ ॥ सुदेवः पुत्रवदनं चुचुम्ब च मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥

ततः स्वाङ्के स्थितं पुत्रं मृतं वीक्षन्‌ मुहुर्मुहुः ॥ स रुदन्विलपन्नेेव गद्‌गदाक्षरमूचिवान्‌ ॥ १७ ॥

सुदेव उवाच ॥ वद पुत्र शुभां वाणीं मम शोकविनाशिनीम्‌ ॥ शीतलां ललितां वत्स मनसो मोदमावह ॥ १८ ॥

जाकर मृत पुत्र का आलिंगन कर उसके शरीर को गोद में लेकर सुदेवशर्म्मा बारम्बार पुत्र का मुख चूमने लगा ॥ १६ ॥

बाद अपने गोद में स्थित मृत पुत्र को बार-बार देखता हुआ, रोता-विलाप करता, गद्‌गद अक्षर से बोला ॥ १७ ॥

सुदेवशर्म्मा बोला – हे पुत्र! मेरे शोक को नाश करने वाले, शीतल, सुन्दर और शुभ वचन को बोलो। हे वत्स! मेरे मन को प्रसन्न करो ॥ १८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7