अध्याय १७

वृद्ध माता-पिता को छोड़कर तुम जाने के योग्य नहीं हो। हे वत्स! वेदाध्ययन के लिये तुम्हारा श्रेष्ठ मित्र बुला रहा है ॥ १९ ॥

और बड़े हर्ष से पढ़ाने के लिये उपाध्याय तुमको बुला रहे हैं। हे पुत्र! शीघ्र उठो। इस समय क्यों सो रहे हो? ॥ २० ॥

तुमको छोड़कर घर नहीं जाऊँगा। घर में मेरा क्या काम है?। तुम्हारे बिना इस समय मेरा घर शून्य जंगल के समान हो गया है ॥ २१ ॥

विहाय पितरौ वृद्धौ न त्वं गन्तुमिहार्हसि ॥ वत्साह्वति ते मित्रं वेदाध्ययनहेतवे ॥ १९ ॥

मुदाऽऽह्वयत्युपाध्यायस्त्वामध्यापनहेतवे ॥ तूर्णमुत्तिष्ठ हे पुत्रं कथं सुप्तोऽसि साम्प्रतम्‌ ॥ २० ॥

त्वां विहाय न गच्छामि गृहे किं मे प्रयोजनम्‌ ॥ शून्यारण्यमिवाद्यैव त्वदृते सदनं मम ॥ २१ ॥

वनेऽपि नैव गच्छामि गमने किं प्रयोजनम्‌ ॥ फलमूलप्रियं त्वं चेन्नोतिष्ठसि ममाग्रतः ॥ २२ ॥

न मया चरितं गर्ह्यं ब्रह्महत्याऽपि नो कृता ॥ केन कर्मविपाकेन पुत्रो मे निधनं गतः ॥ २३ ॥

अहो धातः किमेतावत्फलं लब्धं त्वया महत्‌ ॥ लोचनं मम दीनस्य वृद्धस्याकृष्य निर्दय ॥ २४ ॥

तुमको फल मूल प्रिय हो तो मेरे सामने से उठो। यदि नहीं उठोगे तो वन को भी नहीं जाऊँगा। वन में क्या काम है? ॥ २२ ॥

मैंने कोई निन्दित काम नहीं किया और ब्रह्महत्या भी नहीं की फिर किस कर्म के फल से मेरा पुत्र मर गया ॥ २३ ॥

अहो! ब्रह्मा! तुमने ऐसा करके कौन-सा बड़ा फल प्राप्त किया? हे निर्दय! वृद्ध, दीन मेरे नेत्र को लेकर ॥ २४ ॥

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