अध्याय १७

निर्धन का धन और दोनों स्त्री-पुरुषों का सहारा इस पुत्र को हरण करते तुमको लज्जा? क्यों नहीं होती? ॥ २५ ॥

सर्वत्र तुम दयालु हो परन्तु मेरे विषय में निर्दय हो गये, सो क्यों? अहो! आश्च र्य है। मेरे भाग्य से यह उलटा कैसे हुआ है ॥ २६ ॥

स्वभाव से सुन्दर पुत्र की खोज इस समय मैं कहाँ करूँ? हे पुत्र! तुम्हारे मुख और सुन्दर नेत्र को कहाँ देखूँगा ॥ २७ ॥

निर्धनस्य धनं बालं दम्पत्योरवलम्बनम्‌ ॥ हरतस्ते कथं लज्जाप जायते नहि कुत्रचित्‌ ॥ २५ ॥

सर्वत्र सदयस्त्वं वै मयि निर्दयतां गतः ॥ कथमित्यन्यथाभावो मम भाग्यवशादहो ॥ २६ ॥

कुत्राहं शोधयाम्यद्य पुत्रं प्रकृतिसुन्दरम्‌ ॥ द्रक्ष्ये तवाननं कुत्र पुत्र चारु सुलोचनम्‌ ॥ २७ ॥

पर्यन्यः स्रवते वारि सूते धान्यं वसुन्धरा ॥ गिरयो रत्नाजातानि मुक्तासारं पयोनिधिः ॥ २८ ॥

न तं देशं प्रपश्यामि यत्र पुत्रं भृतं लभेत्‌ ॥ यद्‌गात्रं तु समालिङ्ग्य हृद्‌गतं तापमुत्सृजेत्‌ ॥ २९ ॥

हे वत्स त्वं सकृद्वाचं श्रावयाशु दयां कुरु ॥ विलपत्यति ते माता कुररीव गतत्रपा ॥ ३० ॥

मेघ जल को वर्षाता है। पृथिवी धान्य को पैदा करती है। पर्वत रत्नों  को और समुद्र मुक्तासार मणि को देते हैं ॥ २८ ॥

परन्तु उस देश को नहीं देखता हूँ जहाँ मरा हुआ पुत्र मिलता हो। जिसके शरीर का आलिंगन कर हृदय के ताप को छोड़ता ॥ २९ ॥

हे वत्स! तुम एक बार शीघ्र वचन सुनाओ और दया करो। तुम्हारी माता लज्जाा छोड़कर चील्ह के समान अत्यन्त विलाप करती है ॥ ३० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7