अध्याय १७

हे पुत्र! उसको देख कर तुमको दया क्यों नहीं पैदा होती है? माता-पिता की आज्ञा बिना तुम कभी भी नहीं गये ॥ ३१ ॥

हे पुत्र! हम दोनों से बिना पूछे ही दूर के मार्ग को गये हो क्या? इस समय किसके वेदाध्ययन की उत्तम वाणी को सुनूँगा ॥ ३२ ॥

हे वत्स! आज तुम्हारे और तुम्हारे मनोहर मधुर वचन के स्मरण से मेरा हृदय सौ-सौ टुकड़ा नहीं हो रहा है। क्योंकि मेरा हृदय लोहे के समान है ॥ ३३ ॥

तां दृष्ट्वा तु कथं पुत्र दया नोत्पद्यते तव ॥ अननुज्ञाप्य पितरौ न कदापि भवान्‌ गतः ॥ ३१ ॥

आवामपृष्ट्वा किं दीर्घमार्गं त्वं गतवानसि ॥ वेदाध्ययनसद्वाणीं कस्य श्रोष्यामि साम्प्रतम्‌ ॥ ३२ ॥

त्वामनुस्मरतो वत्स कलवाक्यं मनोहरम्‌ ॥ शतधा दीर्यते नोऽद्य ह्यायसं हृदयं मम ॥ ३३ ॥

मन्ये सुधन्यं किल कौशलेन्द्रम्‌यः काननं दाशरथौ प्रयाते ॥ दधार नोऽसून्सुततापदग्धो धिङ्‌मां सुतस्य प्रलयेऽप्यनष्टम्‌ ॥ ३४ ॥

गोविन्द विष्णो यदुनाथ नाथ श्रीरुक्मिणीप्राणपते मुरारे ॥ दीनानुकम्पिन्‌ भगवन्दयालो मां पाहि पुत्रानलतापतप्तम्‌ ॥ ३५ ॥

देवाधिदेवाखिललोकनाथ गोपाल गोपीश रथाङ्गपाणे ॥ कलिन्दकन्याविषदोषहारिन्‌ मां पाहि पुत्रानलतापतप्तम्‌ ॥ ३६ ॥

हे कोशलेन्द्र! राजा दशरथ! तुमको हम धन्य मानते हैं क्योंकि रामचन्द्र के वन जाने पर पुत्र के ताप से दग्ध वे प्राणों को नहीं रख सके। परन्तु पुत्र के मर जाने पर भी जीवित रहनेवाले मुझको धिक्काकर है ॥ ३४ ॥

हे गोविन्द! हे विष्णो! हे यदुनाथ! हे नाथ! हे श्रीरुक्मिणी के प्राणपति! हे मुरारे! हे दीन पर दया करनेवाले! हे दयालो! पुत्ररूप अग्नि के ताप से सन्तप्त मेरी रक्षा करो ॥ ३५ ॥

हे देवादिदेव! हे समस्त लोक के नाथ! हे गोपाल! हे गोपीश! हे चक्र को हाथ में धारण करने वाले! हे यमुना के विष-दोष को हरनेवाले! पुत्र रूप अग्नि के ताप से सन्तप्त मेरी रक्षा करो ॥ ३६ ॥

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