अध्याय १७

हे बैकुण्ठ के वासी विष्णो! हे नरकासुर के नाशक! हे चराचर के आधार! हे संसार रूप समुद्र से पार करने के लिए जहाज रूप! अर्थात्‌ संसार समुद्र से पार उतारने वाले! हे ब्राह्मादि देवताओं से नमस्कृत चरणपीठ वाले! पुत्ररूप अग्नि के ताप से सन्तप्त मेरी रक्षा करो ॥ ३७ ॥

वैकुण्ठ विष्णो नरकासुरारे चराचराधार भवाब्धिपोत ॥ ब्रह्मादिदेवानतपादपीठ मां पाहि पुत्रानलतापतप्तम्‌ ॥ ३७ ॥

शठो मदन्यो भविता न कोऽपि यो देवकीसूनुवचो विलङ्ध्य ॥ पुत्रे दुराशां कृतवानभाग्यो लभेत को दृष्टविनष्टवस्तु ॥ ३८ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने सुदेवविलापो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

हमारे समान शठ दूसरा कोई नहीं है जो मैंने देवकीपुत्र श्रीकृष्णचन्द्र के वचनों का उल्लंघन कर पुत्र में दुराशा की। कौन अभागा पुरुष भाग्य में न रहने वाली वस्तु को प्राप्त कर सकता है ॥ ३८ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढ़धन्वोपाख्याने सुदेवविलापो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

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