अध्याय १८

नारद जी बोले – हे तपोनिधे! उसके बाद साक्षात्‌ भगवान्‌ बाल्मीकि मुनि ने राजा दृढ़धन्वा को क्या कहा सो आप कहिये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – वह राजर्षि दृढ़धन्वा अपने पूर्व-जन्म का वृ्त्तान्त सुनकर आश्चीर्य करता हुआ मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि मुनि से पूछता है ॥ २ ॥

दृढ़धन्वा बोला – हे ब्रह्मन्‌! आपके नवीन-नवीन सुन्दर अमृत के समान वचनों को बारम्बार पान कर भी मैं तृप्त नहीं हुआ। इसलिए पुनः उसके बाद का वृतान्त कहिये ॥ ३ ॥

नारद उवाच ॥ दृढधन्वा महीपालं किमुवाच ततः परम्‌ ॥ बाल्मीकिर्भगवान्साक्षात्तद्वदस्व तपोनिधे ॥ १ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ दृढधन्वा स राजर्षिः श्रुत्वा प्राक्तनमात्मनः ॥ सविस्मयं समापृच्छद्वाल्मीकिं मुनिसत्तमम्‌ ॥ २ ॥

दृढधन्वोवाच ॥ ब्रह्मंस्तव वचो रम्यं सुधाकल्पं नवं नवम्‌ ॥ पीत्वा पीत्वा न तृप्तोऽस्मि भूयो वद ततः परम्‌ ॥ ३ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ एवं विलपतस्तस्य विप्रस्य जगतीपते ॥ अकालजलदोऽभ्यागाद्‌ गर्जयंश्च दिशो दश ॥ ४ ॥

ववौ वायुः खरस्पर्शः कम्पयन्निव पर्वतान्‌ ॥ बृहल्लभसन्महाविद्युत्स्वनेनापूरयन्‌ दिशः ॥ ५ ॥

यावन्मासं ववर्षैवं मही पूर्णजलाऽभवत्‌ ॥ नासौ विज्ञातवान्‌ किञ्चित्पुत्रशोकाग्नितापितः ॥ ६ ॥

बाल्मीकि मुनि बोले – हे जगतीपते! इस प्रकार उस ब्राह्मण के विलाप करते समय गर्जना से दशो दिशाओं को गिञ्जित करता हुआ असमय में होने वाला मेघ आया ॥ ४ ॥

पर्वतों को कँपाने के समान तीक्ष्ण स्पर्शों वाला वायु बहने लगा। और बिजली अत्यन्य चमकती हुई अपनी आवाज से दश दिशाओं को पूर्ण करती हुई ॥ ५ ॥

इस तरह एक मास तक वृष्टि हुई जिस जल से पृथ्वी भर गई परन्तु पुत्र-शोक रूप अग्नि के ताप से सन्तप्त वह ब्राह्मण कुछ भी नहीं जान सका ॥ ६ ॥

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