अध्याय १८

हृदय में होने वाले सन्देह को दूर करने ले लिए हर्ष के कारण गद्‌गद वचन से बोला – ॥ ५३ ॥

हृदिस्थं संशयं छेत्तुं हर्षगद्गदया गिरा ॥ ५३ ॥

चत्वार्यब्दसहस्रमेवमनिशं तप्तंग तपो दुष्करं तत्रागत्य वचस्त्वया निगदितं यन्मां हरे कर्कशम्‌ ॥ हे  वत्साद्य विलोकितं तव सुतो नैवास्ति नैवास्ति हि तद्वाक्यं व्यतिलङ्घय मे मृतसुतोत्थाने च हेतुं वद ॥ ५४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे सुदेवपुत्रजीवनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

हे हरे! मैंने चार हजार वर्ष पर्यन्त लगातार अत्यन्त दुष्कर तप किया उस समय मेरे को आपने वहाँ आकर जो कठोर वचन कहा कि हे वत्स! हमने अच्छी तरह देखा है। इस समय तुमको निश्चय पुत्र नहीं है। हे हरे! उस वचन का उल्लंघन कर मेरे मृत पुत्र को जीवित करने का कारण क्या है? सो आप कहिये ॥ ५४ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे सुदेवपुत्रजीवनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

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