अध्याय १८

न तो जलपान किया और न भोजन ही किया। केवल हे पुत्र! हे पुत्र! इस प्रकार कहकर विलाप करते हुए ब्राह्मण का उस समय जो मास व्यतीत हुआ ॥ ७ ॥

वह श्रीकृष्णचन्द्र का प्रिय पुरुषोत्तम मास था! सो न जानते हुए उस ब्राह्मण को पुरुषोत्तम मास का सेवन हो गया ॥ ८ ॥

उस पुरुषोत्तम मास के सेवन से अत्यन्त प्रसन्न नूतन मेघ के समान श्यामवर्ण, वनमाला से भूषित हरि भगवान्‌ स्वयं प्रगट हुए ॥ ९ ॥

न पपौ बुभुजे नैव पुत्र पुत्र इति ब्रुवन्‌ ॥ एवं विलपतस्तस्य मासो यो विगतस्तदा ॥ ७ ॥

श्रीकृष्णवल्लनभो मासः सोऽभवत्पुरुषोत्तमः ॥ अजानतोऽपि तस्यासीत्पुरुषोत्तमसेवनम्‌ ॥ ८ ॥

तेनात्यन्तप्रसन्नः सन्‌ प्रादुरासीद्धरिः स्वयम्‌ ॥ नवीनजलदश्यामो वनमालाविभूषितः ॥ ९ ॥

प्रादुर्भूते जगन्नाथे विलीना घनराजयः ॥ ततो ददर्श विप्रौऽसौ श्रीकृष्णं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १० ॥

सहसाङ्कगतं पुत्रदेहं भुवि निधाय च ॥ सपत्नीको नमश्चके दण्डवच्छ्रीहरिं मुदा ॥ ११ ॥

बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा संस्थितः श्रीहरेः पुरः ॥ श्रीकृष्ण एव शरणं ममास्त्विति विचिन्तयन्‌ ॥ १२ ॥

जगत्‌ के नाथ हरि भगवान्‌ के प्रगट होने पर मेघसमूह गायब हो गया। बाद उस ब्राह्मण ने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र को देखा ॥ १० ॥

दर्शन होने के साथ ही गोद में लिए हुए पुत्र के शरीर को जमीन पर रख कर स्त्री सहित ब्राह्मण श्रीकृष्ण भगवान्‌ को दण्डवत्‌ नमस्कार करता हुआ ॥ ११ ॥

हाथ जोड़ कर श्रीकृष्ण भगवान्‌ के सामने खड़ा होकर श्रीकृष्ण भगवान्‌ ही हमारे रक्षक हों ऐसा विचार करता हुआ ॥ १२ ॥

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