अध्याय १८

भगवान्‌ भी पुरुषोत्तम की सेवा से प्रसन्न हो अमृत की वृष्टि करनेवाली अत्यन्त मधुर वाणी से बोले ॥ १३ ॥

श्रीहरि भगवान्‌ बोले – भो भो सुदेव! तुम धन्य हो, इस समय आप भाग्यवान्‌ हो, तुम्हारे भाग्य के वर्णन करने में त्रलोक्य में कौन समर्थ है? ॥ १४ ॥

हे वत्स! हे तपोधन! जो तुम्हारा होने वाला है उसको हम कहेंगे, तुम सुनो। हे ब्राह्मण! बारह हजार वर्ष की आयु वाला पुत्र तुमको होगा ॥ १५ ॥

भगवानपि तुष्टः सन्‌ पुरुषोत्तमसेवनात्‌ ॥ अवोचन्मधुरां वाणीं बृहत्पीयूषवर्षिणीम्‌ ॥ १३ ॥

श्रीहरिरुवाच ॥ भो भो सुदेव धन्योऽसि भाग्यवान्‌ सम्प्रतं भवान्‌ ॥ त्वद्भाग्यं वर्णितुं को वा समर्थो भुवनत्रये ॥ १४ ॥

श्रृणु वत्स प्रवक्ष्येऽहं यत्ते भावि तपोधन ॥ द्वादशाब्दसहस्रायुः पुत्रस्ते भविता द्विज ॥ १५ ॥

अतः परं न सन्देहस्तव पुत्रोद्भवे सुखम्‌ ॥ मयाऽयं ते सुतो दत्तः प्रसन्नेन द्विजोत्तम ॥ १६ ॥

तव पुत्रसुखं दृष्ट्वा देवगन्धर्वमानवाः ॥ सस्पृहास्ते भविष्यन्ति प्रसादान्मे द्विजोत्तम ॥ १७ ॥

अत्र ते कथयिष्यामि इतिहासं पुरातनम्‌ ॥ मार्कण्डेयेन मुनिना पुरा प्रोक्तं रघुं नृपम्‌ ॥ १८ ॥

इसके बाद तुमको पुत्र से होने वाले सुख में सन्देह नहीं है। हे द्विजात्तम! प्रसन्न मन से मैंने यह पुत्र तुमको दिया है ॥ १६ ॥

हमारे प्रसाद से होने वाले तुम्हारे पुत्र-सुख को देखकर हे द्विजोत्तम! देवता, गन्धर्व और मनुष्य लोग पुत्र-सुख की इच्छा करने वाले होंगे ॥ १७ ॥

इस विषय में तुमसे प्राचीन इतिहास मैं कहूँगा, जिस इतिहास को पहले मार्कण्डेय मुनि ने राजा रघु से कहा था ॥ १८ ॥

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