अध्याय १८

प्रथम कोई श्रेष्ठ मनवाले धनुर्नामक मुनीश्वर लोकों को पुत्र रूप मानसिक चिन्ता से जले हुए देखकर दुःखित हुए ॥ १९ ॥

और अमर पुत्र की इच्छा करके दारुण तप करने लगे। हजार वर्ष बीत जाने पर धनुर्मुनि से देवता लोग बोले ॥ २० ॥

हे मुनीश्व्र! तुम्हारे कठिन तप से हम सब प्रसन्न हैं इसलिए अपने मन के अनुसार श्रेष्ठ वर को माँगो ॥ २१ ॥

पुरा मुनीश्वरः कश्चिद्धनुर्नामा महामनाः ॥ पश्यन्‌ पुत्रादिनिर्दग्धान्‌ लोकान्‌ दीनमना अभूत्‌ ॥ १९ ॥

अमरं पुत्रमन्विच्छंस्तपस्तेपे सुदारुणम्‌ ॥ सहस्राब्दे गते काले देवास्तमब्रुवन्मुनिम्‌ ॥ २० ॥

वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वाञ्छितः ॥ प्रसन्नाः स्मो वयं सर्वे तीव्रेण तपसा तव ॥ २१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति देववचः श्रुत्वा सुतृप्तोऽमृतसन्निभम्‌ ॥ वब्रे तपोधनः पुत्रममरं बुद्धिशालिनम्‌ ॥ २२ ॥

तमूचुर्निर्जराः सर्वे नैवं भूतोऽस्ति भूतले ॥ पुनराह मुनिर्देवान्निमित्तायुर्भवत्विति ॥ २३ ॥

सुराः प्रोचुर्निमित्तं किं वद सोऽप्यवदन्मुनिः ॥ असौ महान्‌ गिरिर्यावत्तावदायुर्विधीयताम्‌ ॥ २४ ॥

श्रीनारायण बोले – देवताओं के अमृत तुल्य इस वचन को सुनकर उन तपोधन धनुर्नामक मुनि ने बुद्धिमान्‌ और अमर पुत्र को माँगा ॥ २२ ॥

बाद उस ब्राह्मण से देवताओं ने कहा कि पृथिवी में ऐसा पुत्र नहीं है। तब धनुर्मुनि ने देवताओं से कहा कि अच्छा ऐसा पुत्र दो जिसके आयु की मर्यादा बँधी हो ॥ २३ ॥

देवताओं ने कहा कि कैसी मर्यादा चाहिये? कहो। इस पर उस मुनि ने भी कहा कि यह महान्‌ पर्वत जब तक रहे तब तक उसकी आयु होवे ॥ २४ ॥

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