अध्याय १८

‘ऐसा ही हो’, इस प्रकार कह कर इन्द्रादि देवता स्वर्ग को चले गये। धनुशर्मा ने थोड़े समय में वैसा ही पुत्र को प्राप्त किया ॥ २५ ॥

उस मुनि का पुत्र आकाश में चन्द्र के समान बढ़ने लगा। सोलहवें वर्ष के होने पर मुनीश्व र ने पुत्र से कहा ॥ २६ ॥

हे वत्स! ये मुनि लोग कभी भी अपमान करने योग्य नहीं हैं। इस तरह शिक्षा देने पर भी उस पुत्र ने मुनियों का अनादर किया ॥ २७ ॥

एवमस्त्विति सम्पाद्य सेन्द्रा देवा दिवं ययुः ॥ धनुः शर्मा सुतं लेभे कालेनाल्पेन तादृशम्‌ ॥ २५ ॥

स पुत्रो ववृधे तस्य तारापतिरिवाम्बरे ॥ प्राप्तेध तु षोडशे वर्षे पुत्रं प्राह मुनीश्वरः ॥ २६ ॥

हे वत्स मुनयः सर्वे नावज्ञेयाः कदाचन ॥ शिक्षितोऽपि तथा पुत्रः सोद्वेगानकरोन्मुनीन्‌ ॥ २७ ॥

निमित्तायुर्बलोन्मत्तो ब्राह्मणानवमन्यते ॥ कदाचिन्महिषो नाम मुनिः परमकोपनः ॥ २८ ॥

पूजयामास विधिना शालग्रामशिलां शुभाम्‌ ॥ तदानीं स समागत्य तामादाय त्वरान्वितः ॥ २९ ॥

चिक्षेप निजचाञ्चल्यात्‌ कूपे पूर्णजले हसन्‌ ॥ ततः क्रोधसमाविष्टः कालरुद्र इवापरः ॥ ३० ॥

आयु की मर्यादा के बल से उन्मत्त उसने ब्राह्मणों का अपमान किया। किसी समय परम क्रोधी महिष नामक मुनि ने ॥ २८ ॥

विधि से शुभ फल देने वाले शालग्राम शिला का पूजन किया। उसी समय उस बालक ने वहाँ आकर शालग्राम की शिला को जल्दी से लेकर ॥ २९ ॥

अपनी चंचलता के कारण हँसता हुआ पूर्ण जल वाले कूप में छोड़ दिया। बाद क्रोध से युक्त दूसरे कालरुद्र के समान महिष मुनि ने ॥ ३० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10