अध्याय १८

उस धनुर्मुनि के पुत्र को शाप दिया कि यह अभी मर जाय। परन्तु उसे मृत हुये न देखकर मन में मृत्यु के कारण का ध्यान किया ॥ ३१ ॥

देवताओं ने इस धनुष के पुत्र को निमित्तायु वाला बनाया है। इस तरह चिन्ता करते हुए महिष मुनि ने लम्बी साँस ली ॥ ३२ ॥

जिससे कई कोटि महिष पैदा हो गये और उन महिषों ने पर्वत को टुकड़ा-टुकड़ा कर दिया। उसी समय मुनि का अत्यन्त दुर्मद लड़का मर गया ॥ ३३ ॥

शशाप धनुषः पुत्रमद्यैव म्रियतामयम्‌ ॥ न मृतं पुत्रमालक्ष्य दध्यौ मनसि कारणम्‌ ॥ ३१ ॥

निमित्तायुरय देवैः कृतोऽयं धनुषः सुतः ॥ इति चिन्तापरेणाशु निश्वासः प्रकटीकृतः ॥ ३२ ॥

महिषाः कोटिशो जातास्तैर्गिरिः शकलीकृतः ॥ तदानीं मृतिमापन्नो मुनिपुत्रोऽतिदुर्मदः ॥ ३३ ॥

धनुःशर्माऽतिदुःखेन विललाप मुहुर्मुहुः ॥ विलप्य बहुधा विप्रो गृह्य पुत्रकलेवरम्‌ ॥ ३४ ॥

प्रविवेश चितावह्नौ पुत्रदुःखातिपीडितः ॥ एवं हठाप्तपुत्रा ये न सुखं यान्ति कुत्रचित्‌ ॥ ३५ ॥

वैनतेयेन यो दत्तस्तनयोऽयं तपोधन ॥ तेन त्वं पुत्रवान्‌ लोके स्पृहणीयो भविष्यसि ॥ ३६ ॥

धनुःशर्मा ने अत्यन्त दुःख से बार-बार विलाप किया। बाद अनेक प्रकार विलाप कर पुत्र के शरीर को लेकर॥ ३४ ॥

पुत्र के दुःख से अत्यन्त पीड़ित हो चिता की अग्नि में प्रवेश किया। इस प्रकार हठ से पुत्र प्राप्त करने वाले कहीं भी सुख को नहीं पाते हैं ॥ ३५ ॥

हे तपोधन! गरुड़जी ने यह जो पुत्र दिया है इससे संसार में तुम प्रशंसनीय पुत्रवान्‌ होगे ॥ ३६ ॥

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