अध्याय १८

हे अनघ! मैंने प्रसन्न होकर पुरुषोत्तम के माहात्म्य से इस पुत्र को चिरस्थायी किया है, यह तुमको सुख देने वाला हो ॥ ३७ ॥

पुत्र के साथ सर्वदा गृहस्थाश्रम के सुख को भोगने के बाद तुम ब्रह्मलोक को जाओगे, वहाँ उत्तम सुख ॥ ३८ ॥

देवताओं के वर्ष से हजार वर्ष पर्यन्त भोग कर पृथ्वी पर आओगे हे द्विजोत्तम! यहाँ तुम चक्रवर्ती राजा होगे ॥ ३९ ॥

पुरुषोत्तममाहात्म्यात्‌ प्रसन्नेन मयाऽनघ ॥ सुचिरं स्थापितोऽयं हि तनयः सुखदोऽस्तु ते ॥ ३७ ॥

गार्हस्थ्यमतुलं भुक्त्वा  सह पुत्रेण सर्वदा ॥ ततस्त्वं ब्रह्मणो लोकं गत्वा तत्र महत्सुखम्‌ ॥ ३८ ॥

दिव्याब्दवर्षसाहस्रं भुक्त्वा  गन्तासि भूतले ॥ ततो राजा चक्रवर्ती भविष्यसि द्विजोत्तम ॥ ३९ ॥

दृढधन्वेति विख्यातः समृद्धबलवाहनः ॥ संवत्सराणामयुतं राज्यं भोक्ष्यसि पार्थिवम्‌ ॥ ४० ॥

अव्याहतबलैश्वर्यमाखण्डलपदाधिकम्‌ ॥ गौतमीयं तवाङ्गार्धहारिणी महिषी तदा ॥ ४१ ॥

पतिसेवारता नित्यं नाम्ना च गुणसुन्दरी ॥ चत्वारस्ते सुता भाव्या राजनीतिविशारदाः ॥ ४२ ॥

दृढ़धन्वा नाम से प्रसिद्ध तथा सेना, सवारी से युक्त हो दश हजार वर्ष पर्यन्त पृथिवी के राजा का सुख भोगोगे ॥ ४० ॥

इन्द्र के पद से अधिक अखण्ड बल और ऐश्व्र्य होवेगा। उस समय यह गौतमी स्त्री पटरानी होवेगी ॥ ४१ ॥

नित्य पतिसेवा में तत्पर और गुणसुन्दरी नाम वाली होगी। राजनीति विशारद तुमको चार पुत्र होंगे ॥ ४२ ॥

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