अध्याय १८

और सुन्दर मुखवाली महाभागा सुशीला नाम की कन्या होगी। हे महाभाग! सुरों और असुरों को दुर्लभ संसार के सुखों को भोगकर ॥ ४३ ॥

“इस पृथिवी में हमने सब कुछ किया अब कुछ कर्तव्य नहीं है” इस तरह अज्ञान से मोहित होकर अत्यन्त दुस्तर संसार के विषयों से खिंचे हुए मन वाले ॥ ४४ ॥

तुम संसार रूपी समुद्र के पार करने वाले विष्णु भगवान्‌ को जब भूल जाओगे तब हे विप्र! उस समय वन में यह तुम्हारा पुत्र शुक पक्षी होकर ॥ ४५ ॥

कन्यैका च महाभागा सुशीला सुवरानना ॥ भुक्त्वा  भोंगान्‌ महाभाग सुरासुरसुदुर्लभान्‌ ॥ ४३ ॥

कृतार्थोऽहं धरापीठे इत्यज्ञानविमोहितः ॥ अतिदुस्तरसंसारविषयाकृष्टमानसः ॥ ४४ ॥

यदा विस्मरसे विष्णु संसारार्णवतारकम्‌ ॥ अयं ते तनयो विप्र शुको भूत्वा तदा वने ॥ ४५ ॥

वटवृक्षं समाश्रित्य त्वामेवं बोधयिष्यति ॥ वैराग्योत्पादकं पद्यं पठन्नेरव मुहुर्मुहुः ॥ ४६ ॥

श्रुत्वा वाक्यं शुकप्रोक्तं दुर्मना गृहमेष्यसि ॥ अथ चिन्तार्णवे मग्नं त्यक्त्वाु विषयजं सुखम्‌ ॥ ४७ ॥

बाल्मीकिस्त्वां समागत्य बोधयिष्यति भूसुर ॥ तद्वाक्यैश्छिन्नसन्देहस्त्यक्त्वा  लिङ्गं हरेः पदम्‌ ॥ ४८ ॥

वट वृक्ष के ऊपर बैठ कर, वैराग्य पैदा करने वाले श्लोेक को बार-बार पढ़ता हुआ तुमको इस प्रकार बोध करायेगा ॥ ४६ ॥

शुक पक्षी के वचन को सुनकर दुःखित मन होकर घर आओगे। बाद संसार के विषय सुखों को छोड़कर चिन्तारूपी समुद्र में मग्न ॥ ४७ ॥

हे भूसुर! तुमको बाल्मीकि मुनि आकर ज्ञान करायेंगे। उनके वचन से निःसन्देह हो शरीर को छोड़कर हरि भगवान्‌ के पद को ॥ ४८ ॥

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