अध्याय १८

दोनों स्त्री-पुरुष तुम जाओगे – जो कि पद आवागमन से रहित कहा गया है। इस प्रकार महाविष्णु के कहने पर वह ब्राह्मण-बालक उठ खड़ा हुआ ॥ ४९ ॥

वे दोनों स्त्री-पुरुष ब्राह्मण पुत्र को उठा हुआ देख कर अत्यन्त आनन्दित हो गये। सब देवता लोग भी सन्तुष्ट होकर पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ ५० ॥

गमिष्यसि सपत्नीाकः पुनरावृत्तिवर्जितम्‌ ॥ वदत्येवं महाविष्णौ समुत्तस्थौ द्विजात्मजः ॥ ४९ ॥

दम्पती तौ सुतं दृष्ट्वा महानन्दौ बभूवतुः ॥ सुराः सर्वेऽपि सन्तुष्टा ववृषुः कुसुमाकरान्‌ ॥ ५० ॥

ननाम शुकदेवोऽपि श्रीहरिं पितरौ च तौ ॥ गरुडोऽप्यतिसंहृष्टस्तं दृष्ट्वा ससुतं द्विजम्‌ ॥ ५१ ॥

ब्राह्मणश्चकितो भूत्वा ननाम श्रीहरिं तदा ॥ बद्धाञ्जलिपुटो विप्रः प्रोवाच जगदीश्वरम्‌ ॥ ५२ ॥

शुकदेव ने भी श्रीहरि को और माता-पिता को प्रणाम किया। उस ब्राह्मण को पुत्र के साथ देख कर गरुड़जी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ ५१ ॥

उस समय चकित होकर ब्राह्मण ने श्रीहरि भगवान्‌ को नमस्कार किया और हाथ जोड़ कर जगदीश्वीर से बोला ॥ ५२ ॥

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