अध्याय १९

श्रीसूत जी बोले – हे तपस्वियो! इस प्रकार कहते हुए प्राचीन मुनि नारायण को मुनिश्रेष्ठ नारद मुनि ने मधुर वचनों से प्रसन्न करके कहा ॥ १ ॥

हे ब्रह्मन्‌!तपोनिधि सुदेव ब्राह्मण को प्रसन्न विष्णु भगवान्‌ ने क्या उत्तर दिया सो हे तपोनिधे! मेरे को कहिये ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार महात्मा सुदेव ब्राह्मण ने विष्णु भगवान्‌ से कहा। बाद भक्तवत्सल विष्णु भगवान् ने वचनों द्वारा सुदेव ब्राह्मण को प्रसन्न करके कहा ॥ ३ ॥

सूत उवाच ॥ इति ब्रुवाणं प्राचीनं मुनिमाह तपस्विनः ॥ प्रीणयन्निव सद्वाचा नारदो मुनिसत्तमः ॥ १ ॥

किमुवाचोत्तरं ब्रह्मन्‌ सुदेवं तपसां निधिम्‌ ॥ प्रसन्नो भगवान्‌ विष्णुस्तन्मे ब्रूहि तपोनिधे ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्यमावेदितो विष्णुः सुदेवेन महात्मना ॥ प्रत्याह प्रीणयन्‌ वाचा भगवान्‌ भक्तवत्सलः ॥ ३ ॥

हरिरुवाच ॥ द्विजराज कृतं यत्ते नैतदन्यः करिष्यति ॥ न तद्वेत्ति भवान्नूीनं येनाहं तुष्टिमाप्तावान्‌ ॥ ४ ॥

अयं मम प्रियो मासः प्रयातः पुरुषोत्तमः ॥ तत्सेवा ते समजनि शोकमग्नस्य सस्त्रियः ॥ ५ ॥

एकमप्युपवासं यः करोत्यस्मिस्तपोनिधे ॥ असावनन्तपापानि भस्मीकृत्य द्विजोत्तम ॥ सुरयानं समारुह्य बैकुण्ठं याति मानवः ॥ ६ ॥

हरि भगवान्‌ बोले – हे द्विजराज! जो तुमने किया है उसको दूसरा नहीं करेगा। जिसके करने से हम प्रसन्न हुए उसको आप नहीं जानते हैं ॥ ४ ॥

यह हमारा प्रिय पुरुषोत्तम मास गया है। स्त्री के सहित शोक में मग्न तुमसे उस पुरुषोत्तम मास की सेवा हुई ॥ ५ ॥

हे तपोनिधे! इस पुरुषोत्तम मास में जो एक भी उपवास करता है, हे द्विजोत्तम! वह मनुष्य अनन्त पापों को भस्म कर विमान से बैकुन्ठ लोक को जाता है ॥ ६ ॥

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