अध्याय १९

सो तुमको एक महीना बिना भोजन किये बीत गया और असमय में मेघ के आने से प्रतिदिन प्रातः मध्याह्न सायं तीनों काल में स्नान भी अनायास ही हो गया ॥ ७ ॥

हे तपोधन! तुमको एक महीना तक मेघ के जल से स्नान मिला और उतने ही अखण्डित उपवास भी हो गये ॥ ८ ॥

शोकरूपी समुद्र में मग्न होने के कारण ज्ञान से शक्ति से हीन तुमको अज्ञान से पुरुषोत्तम का सेवन हुआ ॥ ९॥

मासमात्रं निराहारो ह्यकालजलदागमात्‌ ॥ त्रिषु कालेषु ते स्नानं सञ्जातं प्रतिवासरम् ॥ ७ ॥

अभ्रस्नानं त्वया लब्धं मासमात्रं तपोधन ॥ उपवासाश्च ते जातास्तावन्मात्रमखण्डिताः ॥ ८ ॥

शोक्रसागरमग्नस्य पुरुषोत्तमसेवनम् ॥अजानतोऽपिसञ्जा्तं चेतनारहितस्य ते ॥ ९ ॥

त्वदीयसाधनस्यास्य प्रमाणं कः करिष्यति ॥ एकतः साधनान्येव वेदोक्तानि च यानि वै ॥ १० ॥

तानि सर्वाणि संगृह्य ह्येकतः पुरुषोत्तमम्‌ ॥ तोलयामास देवानां सन्निधौ चतुराननः ॥ ११ ॥

लघून्यन्यानि जातानि गुरुश्च पुरुषोत्तमः ॥ तस्माद्भूमिस्थितैर्लोकैः पूज्यते पुरुषोत्तमः ॥ १२ ॥

तुम्हारे इस साधन का तौल कौन कर सकता है ? तराजू के एक तरफ पलड़े में वेद में कहे हुए जितने साधन हैं ॥ १० ॥

उन सबको रख कर और दूसरी तरफ पुरुषोत्तम को रख कर देवताओं के सामने ब्रह्मा ने तोलन किया ॥ ११ ॥

और सब हलके हो गये, पुरुषोत्तम भारी हो गया। इसलिये भूमि के रहने वाले लोगों से पुरुषोत्तम का पूजन किया जाता है ॥ १२ ॥

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