अध्याय १९

हे तपोधन! यद्यपि पुरुषोत्तम मास सर्वत्र है, फिर भी इस पृथिवी लोक में पूजन करने से फल देने वाला कहा है ॥ १३ ॥

इससे हे वत्स! इस समय आप सब तरह से धन्य हैं, क्योंकि आपने इस पुरुषोत्तम मास में उग्र तथा परम दारुण तप को किया ॥ १४ ॥

मनुष्य शरीर को प्राप्त कर जो लोग श्रीपुरुषोत्तम मास में स्नान दान आदि से रहित रहते हैं वे लोग जन्म-जन्मान्तर में दरिद्र होते हैं ॥ १५ ॥

पुरुषोत्तममासस्तु सर्वत्रास्ति तपोधन ॥ तथापि पृथिवीलोके पूजितः सफलो भवेत्‌ ॥ १३ ॥

तस्मात्‌ सर्वात्मना वत्स भवान्‌ धन्योऽस्ति साम्प्रतम्‌ ॥ यदस्मिंस्तप्तवानुग्रं तपः परमदारुणम्‌ ॥ १४ ॥

मानुषं जन्म सम्प्राप्य मासे श्रीपुरुषोत्तमे ॥ स्नानदानादिरहिता दरिद्रा जन्मजन्मनि ॥ १५ ॥

तस्मात्‌ सर्वात्मना यो वै सेवते पुरुषोत्तमम्‌ ॥ स मे वल्लभतां याति धन्यो भाग्ययुतो नरः ॥ १६ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ एवमुक्त्वा  हरिः शीघ्रं जगाम जगदीश्वरः ॥ वैनतेयं समारुह्य बैकुण्ठममलं मुने ॥ १७ ॥

सपत्नीरकः सुदेवस्तु मुमुदेऽहनिशं भृशम्‌ ॥ मृतोत्थितं शुकं दृष्ट्वा पुरुषोत्तमसेवनात्‌ ॥ १८ ॥

इसलिये जो सब तरह से हमारे प्रिय पुरुषोत्तम मास का सेवन करता है वह मनुष्य हमारा प्रिय, धन्य और भाग्यवान्‌ होता है ॥ १६ ॥

श्रीनारायण बोले – हे मुने! जगदीश्व र हरि भगवान्‌ इस प्रकार कह कर गरुड़जी पर सवार होकर शुद्ध बैकुण्ठ भवन को शीघ्र चले गये ॥ १७ ॥

सपत्नी्क सुदेवशर्म्मा पुरुषोत्तम मास के सेवन से मृत्यु से उठे हुए शुकदेव पुत्र को देखकर अत्यन्त दिन-रात प्रसन्न होता भया ॥ १८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7