अध्याय १९

मुझसे अज्ञानवश पुरुषोत्तम मास का सेवन हुआ और वह पुरुषोत्तम मास का सेवन फलीभूत हुआ। जिसके सेवन से मृत पुत्र उठ खड़ा हुआ ॥ १९ ॥

आश्चर्य है कि ऐसा मास कहीं नहीं देखा! इस तरह आश्चर्य करता हुआ उस पुरुषोत्तम मास का अच्छी तरह पूजन करने लगा ॥ २० ॥

वह सपत्नी॥क ब्राह्मणश्रेष्ठ इस पुत्र से प्रसन्न हुआ और शुकदेव पुत्र ने भी अपने उत्तम कार्यों से सुदेवशर्म्मा पिता को प्रसन्न किया ॥ २१ ॥

अजानतो ममैवासीत्पुरुषोत्तमसेवनम्‌ ॥ तदेव सफलं जातं येन पुत्रो मृतोत्थितः ॥ १९ ॥

अहो एतादृशो मासो नैव दृष्टः कदाचन ॥ इत्येवं विस्मयाविष्टस्तं मासं समपूजयत्‌ ॥ २० ॥

तेन पुत्रेण मुमुदे सपत्नीटको द्विजोत्तमः ॥ पितरं नन्दयामास शुकदेवोऽपि सत्कृतैः ॥ २१ ॥

स्तुवन्‌ मासं च विष्णुं च पूजयामास सादरम्‌ ॥ कर्ममार्गस्पृहां त्यक्त्वा  भक्तिमार्गैकसस्पृहः ॥ २२ ॥

सर्वेदुःखापहं मासं वरिष्ठं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ जपहोमादिभिस्तस्मिन्नभजच्छ्रीहरिं स्त्रिया ॥ २३ ॥

भुक्त्वा ऽथ विषयान्‌ सर्वान्‌ सहस्राब्दमहर्निशम्‌ ॥ जगाम परमं लोकं सपत्नी्को द्विजोत्तमः ॥ २४ ॥

सुदेवशर्म्मा ने पुरुषोत्तम मास की प्रशंसा की तथा आदर के साथ श्रीविष्णु भगवान्‌ की पूजा की और कर्ममार्ग से होने वाले फलों में इच्छा का त्याग कर एक भक्तिमार्ग में ही प्रेम रक्खा ॥ २२ ॥

श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास को समस्त दुःखों का नाश करने वाला जान कर, उस मास के आने पर स्त्री के साथ जप-हवन आदि से श्रीहरि भगवान्‌ का सेवन करने लगा ॥ २३ ॥

वह सपत्नीरक श्रेष्ठ ब्राह्मण निरन्तर एक हजार वर्ष संसार के समस्त विषयों का उपयोग कर विष्णु भगवान्‌ के उत्तम लोक को प्राप्त हुआ ॥ २४ ॥

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