अध्याय १९

जो योगियों को भी दुष्प्राप्य है, फिर यज्ञ करने वालों को कहाँ से प्राप्त हो सकता है? जहाँ जाकर विष्णु भगवान्‌ के सन्निकट वास करते हुए शोक के भागी नहीं होते हैं ॥ २५ ॥

वहाँ पर होने वाले सुखों को भोग कर गौतमी तथा सुदेवशर्म्मा दोनों स्त्री-पुरुष इस पृथ्वी में आये। वही तुम सुदेवशर्म्मा इस समय दृढ़धन्वा नाम से प्रसिद्ध पृथिवी के राजा हुये ॥ २६ ॥

पुरुषोत्तम नाम के सेवन से समस्त ऋद्धियों के भोक्ता हुये। हे राजन्‌! यह आपकी पूर्व जन्म की पतिदेवता गौतमी ही पटरानी है ॥ २७ ॥

योगिनामपि दुष्प्रापं याजकानां तु तत्कुतः ॥ यत्र गत्वा न शोचन्ति वसन्तो हरिसन्निधौ ॥ २५ ॥

तत्रत्यं सुखमासाद्य सपत्नीनको भवं गतः ॥ स एव दृढधन्वा स्वं प्रथितः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥

पुरुषोत्तममासस्य सेवनात्‌ सकलर्द्धिभाक्‌ ॥ महिषीयं पुरा राजन्‌ गौतमी पतिदेवता ॥ २७ ॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं पृष्टवानसि यन्मम ॥ शुकस्तु तव भूपाल पूर्वजन्मनि यः सुतः ॥ २८ ॥

शुकदेव इति ख्यातो हरिणा योऽनुजीवितः ॥ द्वादशाब्दसहस्रायुर्भुक्त्वािवैकुण्ठमीयिवान्‌ ॥ २९ ॥

स एवारण्यसरसि वटवृक्षं समाश्रितः ॥ त्वामेवागतमालोक्य पितरं पूर्वजन्मनः ॥ ३० ॥

हे भूपाल! जो आपने मुझसे पूछा था सो सब मैंने कहा और शुक पक्षी तो पूर्वजन्म में जो पुत्र ॥ २८ ॥

शुकदेव नाम से प्रसिद्ध थे और हरि भगवान्‌ ने जिसको जिलाया था वह बारह हजार वर्ष तक आयु भोग कर बैकुण्ठ को गया ॥ २९ ॥

वहाँ वन के तालाब के समीप वट वृक्ष पर बैठकर पूर्वजन्म के पिता तुमको आये हुए देखकर ॥ ३० ॥

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