अध्याय १९

मेरे हितों के उपदेश करनेवाले, प्रत्यक्ष मेरे दैवत, विषयरूपी सर्प से दूषित संसार सागर में मग्न ॥ ३१ ॥

इस प्रकार पिता को देख कर और अत्यन्त कृपा से युक्त वह शुक पक्षी विचार करने लगा कि यदि मैं इस राजा को ज्ञान का उपदेश नहीं करता हूँ तो मेरा बन्धन होता है ॥ ३२ ॥

जो पुत्र अपने पिता को पुन्ना म नरक से रक्षा करता है वही पुत्र है। आज मेरा यह श्रुति के अर्थ का ज्ञान भी वृथा हो जायगा ॥ ३३ ॥

हितानामुपदेष्टारं प्रत्यक्षं दैवतं मम ॥ संसारसागरे मग्नं विषयव्यालदूषिते ॥ ३१ ॥

अत्यन्तकृपयाऽविष्टश्चिन्तयामास कीरजः ॥ न बोधयामि चेद्भूपं ममापि बन्धनं भवेत्‌ ॥ ३२ ॥

पुन्नामनरकाद्यस्तु त्रायते पितरं सुतः ॥ इतिश्रुत्यर्थबोधोऽपि स्यादेवाद्यान्यथा मम ॥ ३३ ॥

तस्मादुपकरिष्यामि पितरं पूर्वजन्मनः ॥ अवधार्य वचश्चेत्थं कीरजोऽजीगदन्नृ्प ॥ ३४ ॥

इत्येतत्कथितं सर्वं यद्यत्पृष्टं त्वयाऽनघ ॥ अतः परं गमिष्यामि सरयूं पापनाशिनीम्‌ ॥ ३५ ॥

इसलिये अपने पूर्वजन्म के पिता का उपकार करूँगा। हे राजन्‌ दृढ़धन्वा! इस तरह निश्चय करके वह शुक पक्षी वचन बोला ॥ ३४ ॥

हे पाप रहित! राजन्‌! जो आपने पूछा सो यह सब मैंने कहा। अब इसके बाद पापनाशिनी सरयू नदी को जाऊँगा  ॥ ३५ ॥

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