अध्याय २

सूतजी बोले – राजा परीक्षित् के पूछने पर भगवान् शुक द्वारा कथित परम पुण्यप्रद श्रीमद्भागवत शुकदेवजी के प्रसाद से सुनकर अनन्तर राजा का मोक्ष भी देख कर ॥ १ ॥अब यहाँ यज्ञ करने को उद्यत ब्राह्मणों को देखने के लिये मैं आया हूँ और यहाँ यज्ञ में दीक्षा लिये हुए ब्राह्मणों का दर्शन कर मैं कृतार्थ हुआ ॥ २ ॥ऋषि बोले – हे साधो! अन्य विषय की बातों को त्यागकर भगवान् कृष्णद्वैपायन के प्रसाद से उनके मुख से जो आपने सुना है वही अपूर्व विषय हे सूत! आप हम लोगों से कहिये॥ ३ ॥

सूत उवाच ॥ राजा पृष्‍टं शुकेनोक्‍तं श्रीमद्भागवतं परम्‌ ॥ शुकप्रसादात्तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा राज्ञो विमोक्षणम्‌ ॥ १ ॥

अत्राहमागतो विधान्‌ सत्रोद्यमपरायणान्‌ ॥ द्रष्टुकामः कृतार्थोऽहं जातो दीक्षितदर्शनात्‌ ॥ २ ॥

ऋषय ऊचुः ॥ साधो वार्त्तान्तरं त्यक्त्वा पूर्वं यत्तु श्रुतं त्वया ॥ कृष्‍णद्वैपायनमुखाद्यच्छ्रुतं तद्वदस्व नः ॥ ३ ॥

सारात्‌ सारतरां पुण्‍यां कथामात्मप्रसादनीम्‌ ॥ पाययस्व महाभाग सुधाधिकतरां पराम्‌ ॥ ४ ॥

सूत उवाच ॥ विलोमजोऽपि धन्योऽस्मि यन्मां पृच्छत सत्तमाः ॥ यथाज्ञानं प्रवक्ष्यामि यच्छ्रुतं व्यासवक्‍त्रतः ॥ ५ ॥

एकदा नारदोऽगच्छन्नरनारायणालयम्‌ ॥ तापसैर्बहुभिः सिद्धैर्देवैरपि निषेवितम्‌ ॥ ६ ॥

हे महाभाग! संसार में जिससे परे कोई सार नहीं है, ऐसी मन को प्रसन्न करने वाली और जो सुधा से भी अधिकतर हितकर है ऐसी पुण्य कथा, हम लोगों को सुनाइये॥ ४ ॥

सूतजी बोले – विलोम (ब्राह्मण के चरु में क्षत्रिय का चरु मिल जाने) से उत्पन्न होने पर भी मैं धन्य हूँ जो श्रेष्ठ पुरुष भी आप लोग मुझसे पूछ रहे हैं। भगवान् व्यास के मुख से जो मैंने सुना है वह यथाज्ञान मैं कहता हूँ ॥ ५ ॥

एक समय नारदमुनि नरनारायण के आश्रम में गये। जो आश्रम बहुत से तपस्वियों, सिद्धों तथा देवताओं से भी युक्त है॥ ६ ॥

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