अध्याय २

और बैर, बहेड़ा, आँवला, बेल, आम, अमड़ा, कैथ, जामुन, कदम्बादि और भी अनेक वृक्षों से सुशोभित है ॥ ७ ॥

भगवान् विष्णु के चरणों से निकली हुई पवित्र गंगा और अलकनन्दा भी जहाँ बह रही हैं। ऐसे नर नारायण के स्थान में श्री नारद मुनि ने जाकर महामुनि नारायण को प्रणाम किया ॥ ८ ॥

बदर्यक्षामलैर्विल्वैराम्रैराम्रातकैरपि ॥ कपित्थैर्जम्बुनीपधैर्वृक्षैरन्यैर्विराजितम्‌ ॥ ७ ॥

विष्‍णुपादोदकी पुण्याऽलकनन्दाऽस्ति तत्र च ॥ तत्र गत्वाऽनमद्दवें नारायणमहामुनिम्‌ ॥ ८ ॥

परब्रह्मणि संलग्नमानसं च जितेन्द्रियम्‌ ॥ जितारिषट्‌कममलं प्रस्फुरद्‌बहुलप्रभम्‌ ॥ ९ ॥

नमस्कृत्वा च साष्टाङ्गं देवदेवं तपस्विनम्‌ ॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव नारदो विभुम्‌ ॥ १० ॥

नारद उवाच ॥ देवदेवजगन्नाथ कृपाकूपारसत्पते ॥ सत्यव्रतस्रिसत्योऽसि सत्यात्मा सत्यसंभवः ॥ ११ ॥

और परब्रह्म की चिन्ता में लगा हुआ है मन जिसका ऐसे, जितेन्द्रिय, काम क्रोधादि छओ शत्रुओं को जीते हुए, निर्मल, चमक रही है अत्यन्त प्रभा जिनके शरीर से, ऐसे देवताओं के भी देव, तपस्वी नारायण को साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर और हाथ जोड़कर नारद उस मुनि व्यापक प्रभु की स्तुति करने लगे ॥ ९-१० ॥

नारदजी बोले – हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे कृपासागर सत्पते! आप सत्यव्रत हो, त्रिसत्य हो, सत्य आत्मा हो, और सत्यसम्भव हो ॥ ११ ॥

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