अध्याय २

हे सत्ययोने! आप को नमस्कार है। मैं आपकी शरण में आया हूँ। आपका जो तप है वह सम्पूर्ण प्राणियों की शिक्षा के लिये और मर्यादा की स्थापना के लिये है ॥ १२ ॥

यदि आप तपस्या न करें तो – जैसे कलियुग में एक के पाप करने से सारी पृथ्वी डूबती है वैसे ही एक के पुण्य करने से सारी पृथ्वी तरती है इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ १३ ॥

सत्ययोने नमस्तेऽस्तु त्वामहं शरणं गतः ॥ तपस्तेऽखिलशिक्षार्थं मर्यादास्थापनाय च ॥ १२ ॥

यथैकेन कृतात्‌ पापात्‌ कलौ मज्जति मेदिनी ॥ तथैवैककृतात्‌ पुण्यात्तरतायं न संशयः ॥ १३ ॥

कृतादिषु यथा पूर्वमेकरं तत्समस्तगम्‌ ॥ तादृक्‌स्थिति निराकृत्य कलौ कर्त्तेव केवलम्‌ ॥ १४ ॥

लिप्यते पुण्यपापाभ्यामिति ते तपसि स्थितिः ॥ भगवान्‌ प्राणिनः सव विषयासक्तमानसाः ॥ १५ ॥

दारापत्यगृहासक्तास्तेषां हितकरं च यत्‌ ॥ ममापि हितकृत्किञ्चिद्विचार्य वक्‍तुमर्हसि ॥ १६ ॥

त्वन्मुखाच्छ्रोतुकामोऽहं ब्रह्मलोकादिहागतः ॥ उपकारप्रियो विष्‍णुरिति वेदे विनिश्चितम्‌ ॥ १७ ॥

‘पहिले सत्ययुग आदि में जैसे एक पाप करता था तो सभी पापी हो जाते थे’ ऐसी स्थिति हटाकर कलियुग में केवल कर्ता ही पापों से लिप्त होता है यह आप के तप की स्थिति है। हे भगवन्! कलि में जितने प्राणी हैं सब विषयों में आसक्त हैं ॥ १४-१५ ॥

स्त्री, पुत्र गृह में लगा है चित्त जिनका ऐसे प्राणियों का हित करने वाला जो हो और मेरा भी थोड़ा कल्याण हो ऐसा विषय विचार कर आप कहने के योग्य हैं ॥ १६ ॥

आपके मुख से सुनने की इच्छा से मैं ब्रह्मलोक से यहाँ आया हूँ। उपकारप्रिय विष्णु हैं ऐसा वेदों में निश्रित है ॥ १७ ॥

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