अध्याय २

इसलिये लोकोपकार के लिये कथा का सार इस समय आप सुनाइये। जिसके श्रवणमात्र से निर्भय मोक्षपद को प्राप्त करते हैं ॥ १८ ॥

इस प्रकार नारदजी का वचन सुन भगवान्‌ ऋषि आनन्द से खिलखिला उठे और भुवन को पवित्र करने वाली पुण्यकथा आरम्भ की ॥ १९ ॥

तस्माल्लोकोपकाराय कथासारं वदाऽधुना ॥ यस्य श्रवणमात्रेण निर्भयं पदम्‌ ॥ १८ ॥

नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य भगवानृषिः ॥ कथां कथितुमारेभे पुण्यां भुवनपावनीम्‌ ॥ १९ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ गोपाङ्गनावदनपङ्कजषट्पदस्य रासेश्‍वरस्य रसिकाभरणस्य पुंसः ॥ वृन्दावने विहरतो व्रजभर्तुरादेः पुण्यां कथां भगवतः श्रृणु नारद त्वम्‌ ॥ २० ॥

चक्षुर्निमेषपततो जगतां विधाता तत्कर्म वत्स कथितुं भुवि कः समर्थः ॥ त्वं चापि नारदमुने भगवच्चरित्रं जानासि सारसरसं वचसामगम्यम्‌ ॥ २१ ॥

श्रीनारायण बोले – गोपों की स्त्रियों के मुखकमल के भ्रमर, रास के ईश्‍वर, रसिकों के आभरण, वृन्दावनबिहारी, व्रज के पति आदिपुरुष भगवान् की पुण्य कथा को कहते हैं हे नारद! आप सुनो ॥ २० ॥

जो निमेपमात्र समय में जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले हैं उनके कर्मों को हे वत्स! इस पृथ्वी पर कौन वर्णन कर सकता है? हे नारदमुने! आप भी भगवान्‌ के चरित्र का सरस सार जानते हैं। और यह भी जानते हैं कि भगवच्चरित्र वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता ॥ २१ ॥

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