अध्याय २

तथापि अद्भुत पुरुषोत्तम माहात्म्य आदर से कहते हैं। यह पुरुषोत्तम माहात्म्य दरिद्रता और वैधव्य को नाश करने वाला, यश का दाता एवं सत्पुत्र और मोक्ष को देने वाला है अतः शीघ्र ही इसका प्रयोग करना चाहिये ॥ २२ ॥

नारद बोले – हे मुने! पुरुषोत्तम नामक कौन देवता हैं? उनका माहात्म्य क्या है? यह अद्‌भुत-सा प्रतीत होता है, अतः आप मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ २३ ॥

तथापि वक्ष्ये पुरुषोत्तमस्य माहात्म्यमत्यद्‌भुतमादरेण ॥ दारिद्रयवैधव्यहरं यशस्यं सत्पुत्रदं मोक्षदमाशु सेव्यम्‌ ॥ २२ ॥

नारद उवाच ॥ पुरुषोत्तमस्तु को देवो माहात्म्यं तस्य किं मुने ॥ अत्यद्‌भुतमिवाभाति विस्तरेण वदस्व हे ॥ २३ ॥

सूत उवाच ॥ नारदोक्‍तं वचः श्रुत्वा मुनिर्नारायणोऽब्रवीत्‌ ॥ समाधाय मनः सम्यक्‌ मुहूर्तं पुरुषोत्तमे ॥ २४ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ पुरुषोत्तमेति मासस्य नामाप्यस्ति सहेतुकम्‌ ॥ तस्य स्वामी कृपासिन्धु पुरुषोत्तम उच्यते ॥ २५ ॥

ऋषिभिः प्रोच्यते तस्मान्मासः श्रापुरुषोत्तमः ॥ तस्य व्रतविधानेन प्रीतः स्यात्‌ पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥

सूतजी बोले – श्रीनारद का वचन सुन नारायण क्षणमात्र पुरुषोत्तम में अच्छी तरह मन लगाकर बोले ॥ २४ ॥

श्रीनारायण बोले – ‘पुरुषोत्तम’ यह मास का नाम जो पड़ा है वह भी कारण से युक्त। पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं ॥ २५ ॥

इसीलिये ऋषिगण इसको पुरुषोत्तमास कहते हैं। पुरुषोत्तम मास के व्रत करने से भगवान् पुरुषोत्तम प्रसन्न होते हैं ॥ २६ ॥

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