अध्याय २

नारदजी बोले – चैत्रादि मास जो हैं वे अपने-अपने स्वामी देवताओं से युक्त हैं ऐसा मैंने सुना है परन्तु उनके बीच में पुरुषोत्तम नाम का मास नहीं सुना है ॥ २७ ॥

पुरुषोत्तम मास कौन हैं? और पुरुषोत्तम मास के स्वामी कृपा के निधि पुरुषोत्तम कैसे हुए? हे कृपानिधे! यह आप मुझसे कहिये ॥ २८ ॥

नारद उवाच ॥ सन्ति मध्वादयो मासाः सेश्वरास्ते श्रुता मया ॥ तन्मध्ये न श्रुतो मासः पुरुषोत्तमसंज्ञक ॥ २७ ॥

पुरुषोत्तमस्तु को मासस्तस्य स्वामी कृपानिधिः ॥ पुरुषोत्तमः कथं जातस्तन्मे ब्रूहि कृपानिधे ॥ २८ ॥

स्वरूपं तस्य मासस्य सविधानं वद प्रभो ॥ किं कर्तव्यं कथं स्‍नानं किं दानं तत्र सत्पते ॥ २९ ॥

जपपूजोपवासादि साधनं किं च भण्‍यताम्‌ ॥ तुष्‍येत्‌ कृतेन को देवः किं फलं वा प्रयच्छति ॥ ३० ॥

एतदन्यच्च यत्‍किञ्चित्तत्त्वं ब्रूहि तपोधन ॥ अनापृष्ठमपि ब्रूयुः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ३१ ॥

इस मास का स्वरूप विधान के सहित हे प्रभो! कहिये। हे सत्पते! इस मास में क्या करना? कैसे स्‍नान करना? क्या दान करना? ॥ २९ ॥

इस मास का जप पूजा उपवास आदि क्या साधन है? कहिये। इस मास के विधान से कौन देवता प्रसन्न होते हैं? और क्या फल देते हैं? ॥ ३० ॥

इसके अतिरिक्त और जो कुछ भी तथ्य हो वह हे तपोधन! कहिये। साधु दीनों के ऊपर कृपा करने वाले होते हैं वे बिना पूछे कृपा करके सदुपदेश दिया करते हैं ॥ ३१ ॥

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