अध्याय २

इस पृथ्वी पर जो मनुष्य दूसरों के भाग्य के अनुवर्ती, दरिद्रता से पीड़ित, नित्य रोगी रहने वाले, पुत्र चाहने वाले ॥ ३२ ॥

जड़, गूँगे, ऊपर से अपने को बड़े धार्मिक दरसाने वाले, विद्या विहीन, मलिन वस्त्रों को धारण करने वाले, नास्तिक, परस्त्रीगामी, नीच, जर्जर, दासवृत्ति करने वाले ॥ ३३ ॥

नरा ये भुवि जायन्ते परभाग्यानुवर्तिनः ॥ दारिद्रयपीडिता नित्यं रोगिणः पुत्रकाङ्क्षिणाः ॥ ३२ ॥

जडा मूका दामभिकाश्च हीनविद्याः कुचैलिनः ॥ नास्तिका लम्पटा नीचा जर्जराः परसेविनः ॥ ३३ ॥

नष्टाशा भग्नसङ्कल्पाः क्षीणतत्त्वा कुरूपिणः ॥ रोगिणः कुष्ठिनो व्यङ्गा नेत्रहीनाश्च केचन ॥ ३४ ॥

इष्टमित्रकलत्राप्तपितृमातृवियोगिनः ॥ शोकदुःखादिशुष्काङ्गाः स्वेष्टवस्तुविवर्जिताः ॥ ३५ ॥

पुनर्नवंविधास्ते स्युर्यत्‍कृतेन श्रुतेन च ॥ पठितेनानुचीर्णेन तद्वदस्व मम प्रभो ॥ ३६ ॥

आशा जिनकी नष्ट हो गयी है, संकल्प जिनके भग्न हो गये हैं, तत्त्व जिनके क्षीण हो गये हैं, कुरुपी, रोगी, कुष्ठी, टेढ़े-मेढ़े अंग वाले, अन्धे ॥ ३४ ॥

इष्टवियोग, मित्रवियोग, स्त्रीवियोग, आप्तपुरुषवियोग, मातापिताविहीन, शोक दुःख आदि से सूख गये हैं अंग जिनके, अपनी इष्ट वस्तु से रहित उत्पन्न हुआ करते हैं ॥ ३५ ॥

वैसे जिस अनुष्ठान के करने और सुनने से, पुनः उत्पन्न न हों, हे प्रभो! ऐसा प्रयोग हमको सुनाइये ॥ ३६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8