अध्याय २

वैधव्य, वन्ध्यादोष, अंगहीनता, दुष्ट व्याधियाँ, रक्तपित्त आदि, मिर्गी राजयक्ष्मादि जो दोष हैं ॥ ३७ ॥

इन दोषों से दु:खित मनुष्यों को देखकर हे जगन्नाथ! मैं दुःखी हूँ। अतः मेरे ऊपर दया करके ॥ ३८ ॥

हे ब्रह्मन्! मेरे मन को प्रसन्न करने वाले विषय को विस्तार से कहिये। हे प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, समस्त तत्त्वों के आयतन हैं ॥ ३९ ॥

वैधव्यं वन्ध्यतादोषं हीनाङ्गत्वदुराधयः ॥ रक्तपित्ताद्यपस्मारराजयक्ष्मादयश्च ये ॥ ३७ ॥

एतैर्दोषसमूहैश्चदुःखितान्‌ वीक्ष्यमानवान्‌ ॥ दुःखितोऽस्मि जगन्नाथ कृपां कृत्वा ममोपरि ॥ ३८ ॥

विस्तरेण वद ब्रह्मन्‌ मन्मनोमोदहेतुकम्‌ ॥ सर्वज्ञः सर्वतत्त्वानां निधानं त्वमसि प्रभो ॥ ३९ ॥

सूत उवाच॥ इति विधितनयोदितं रसालं जनहितहेतुं निशम्य देवदेवः ॥ अभिनवघनरावरम्यवाचाऽवददभिपूज्य मुनिं सुधांशुशान्तम्‌ ॥ ४० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे प्रश्‍नविधिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

सूतजी बोले – इस प्रकार नारद के परोपकारी मधुर वचनों को सुन कर देवदेव नारायण, चन्द्रमा की तरह शान्त महामुनि नारद से नये मेघ के समान गम्भीर वचन बोले ॥ ४० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

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