अध्याय २०

सूतजी बोले – हे विप्रो! नारायण के मुख से राजा दृढ़धन्वा के पूर्वजन्म का वृत्तान्त श्रवणकर अत्यन्त तृप्ति न होने के कारण नारद मुनि ने श्रीनारायण से पूछा ॥ १ ॥

नारद जी बोले – हे तपोधन! महाराज दृढ़धन्वा ने मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि जी से क्या कहा? सो विस्तार सहित विनीत मुझको कहिये ॥ २ ॥

नारायण बोले – हे नारद! सुनिये। राजा दृढ़धन्वा ने महाप्राज्ञ मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि मुनि की प्रार्थना कर, जो कुछ कहा सो मैं कहूँगा ॥ ३ ॥

सूत उवाच ॥ नारायणमुखाच्छ्रुत्वा प्राक्तनं दृढधन्वनः ॥ नातितृप्तमना विप्रा नारदः पृष्टवान्मुनिम्‌ ॥ १ ॥

नारद उवाच ॥ किमुवाच महाराजो बाल्मीकिं मुनिसत्तमम्‌ ॥ तन्मे वद विनीताय तपोधन सुविस्तरम्‌॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्येऽहं यदुक्तं दृढधन्वना ॥ अनुनीय महाप्राज्ञं बाल्मीकिं मुनिसत्तमम्‌ ॥ ३ ॥

दृढधन्वोवाच ॥ पुरुषोत्तममासोऽयं कथं कार्यो मुमुक्षुभिः ॥ कीदृशी कस्य पूजा च किं दानं को विधिर्मुने ॥ ४ ॥

एतत्सर्वं समाचक्ष्व सर्वलोकहिताय मे ॥ सर्वलोकहितार्थाय चरन्ति हि भवादृशाः ॥ ५ ॥

असौ मासः स्वयं साक्षाद्भगवान्‌ पुरुषोत्तमः ॥ तस्मिन्कृते महत्पुण्यं त्वन्मुखात्संश्रुतं मया ॥ ६ ॥

दृढ़धन्वा बोला – मोक्ष की इच्छा करने वाले लोगों से पुरुषोत्तम मास का सेवन किस प्रकार किया जाय? क्या दान दिया जाय? और इसकी विधि क्या है? ॥ ४ ॥

यह सब संपूर्ण लोक के कल्याण के लिये मुझसे कहिये, क्योंकि आपके समान महात्मा संसार के हित के लिये ही पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं ॥ ५ ॥

यह पुरुषोत्तम मास स्वयं साक्षात्‌ पुरुषोत्तम भगवान्‌ हैं, उस पुरुषोत्तम मास के सेवन से महान्‌ पुण्य होता है। यह बात मैंने आपके मुख से भलीभाँति सुनी है ॥ ६ ॥

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