अध्याय २०

उस शरीर की रक्षा धर्म के लिये और धर्म की रक्षा ज्ञान के लिये हुआ करती है और ज्ञान से मोक्ष सुलभ हुआ करता है। इसलिये धर्म को करना चाहिये ॥ ५५ ॥

देहरूप वृक्ष का फल सनातनधर्म कहा गया है जो शरीर धर्म से रहित है वह बाँझ वृक्ष के समान निष्फल है ॥ ५६ ॥

सहायता के लिये न माता कही गई है न स्त्री-पुत्र आदि कहे गये हैं तथा न पिता, न सहोदर भाई, न धन कहे गये हैं। केवल धर्म ही उसका प्रधान कारण कहा गया है ॥ ५७ ॥

तद्रक्षितं तु धर्मार्थे धर्मो ज्ञानार्थमेव हि ॥ ज्ञानेन सुलभो मोक्षस्तस्माद्धर्मं समाचरेत्‌ ॥ ५५ ॥

देहरूपस्य वृक्षस्य फलं धर्मः सनातनः ॥ धर्महीनस्तु यो देहो निष्फलो वन्ध्यवृक्षवत्‌ ॥ ५६ ॥

न माता च सहायार्थे न कलत्रसुतादयः ॥ न पिता सोदरा वित्तं धर्मस्तिष्ठति केवलम्‌ ॥ ५७ ॥

जरा व्याघ्रीव भयदा व्याधयः शत्रवो यथा ॥ आयुर्याति प्रतिदिनं भग्नभाण्डात्‌ पयो यथा ॥ ५८ ॥

तरङ्गत्तरला लक्ष्मीर्यौवनं कुसुमोपमम्‌ ॥ विषयाः स्वप्नविषया इव सर्वे निरर्थकाः ॥ ५९ ॥

चलं चित्तं चलं वित्तं चलं संसारजं सुखम्‌ ॥ एवं ज्ञात्वा विरक्तः सन्‌ धर्माभ्यासपरो भवेत्‌ ॥ ६० ॥

वृद्धावस्था सिंहिनी के समान भय देने वाली है और रोग शत्रु के समान पीड़ा देने वाले हैं। फूटे हुए बर्तन से जल गिरने के समान आयु प्रतिदिन क्षीण होती रहती है ॥ ५८ ॥

जल के तरंग के समान चंचल लक्ष्मी, पुष्प के समान क्षणमात्र में मुरझाने वाली युवावस्था, स्वप्न के राज्यसुख के समान संसार के विषयसुख प्रभृति सब निरर्थक हैं ॥ ५९ ॥

धन चंचल है, चित्त चंचल है और संसार में होने वाला सुख चंचल है। ऐसा जान कर संसार से विरक्त होकर धर्म के साधन में तत्पर होवे ॥ ६० ॥

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