अध्याय २०

जैसे सर्प से आधा देह निगले जाने पर भी मेढक मक्खी को खाने की इच्छा करता ही रहता है, उसी प्रकार काल से ग्रसा हुआ जीव दूसरे को पीड़ा देने में तथा दूसरे का धन अपहरण करने में प्रेम करता है ॥ ६१ ॥

मृत्यु से ग्रस्त आयु वाले पुरुष को सुख क्या हर्ष करता है? वध के लिये वधस्थान को पहुँचाये जाने वाले पशु के समान सब सुख व्यर्थ हैं ॥ ६२ ॥

जब धर्म करने के लिये चित्त होत है तो उस समय धन का मिलना सुलभ नहीं होता है, जब धन होता है तो उस समय चित्त धर्म करने के लिये उत्सुक नहीं होता है ॥ ६३ ॥

अर्धग्रस्तोऽहिना भेको मक्षिकामत्तुंमिच्छाते ॥ कालग्रस्तस्तया जीवः परपीडाधनाहृतः ॥ ६१ ॥

मृत्युग्रस्तायुषः पुंसः किं सुखं हर्षयत्यहो ॥ आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव निरर्थकम्‌ ॥ ६२ ॥

धर्मार्थं च यदा चित्तं न वित्तं सुलभं तदा ॥ यदा वित्तं न च तदा चित्तं धर्मोन्मुखं भवेत्‌ ॥ ६३ ॥

चित्तं वित्तं यदा स्यातां सत्पात्रं न तदा लभेत्‌ ॥ एतत्त्रितयसम्बन्धो यदा काले तु सम्भवेत्‌ ॥ ६४ ॥

अविचार्य तदा धर्म यः करोति स बुद्धिमान्‌ ॥ वित्तप्राचुर्यसंसाध्यधर्माः सन्ति सहस्रशः ॥ ६५ ॥

पुरुषोत्तमे स्वल्पवित्तसाध्यो धर्मो महान्‌ भवेत्‌ ॥ स्नानं दानं कथायां च विष्णोः स्मरणमेव च ॥ ६६ ॥

जब चित्त और धन दोनों होते हैं तो उस समय सम्पात्र नहीं मिलते हैं। इसलिये चित्त, वित्त, सत्पात्र इन तीनों का जिस समय सम्बन्ध हो जाय ॥ ६४ ॥

उसी समय बिना विचार किये ही जो धर्म को करता है वही बुद्धिमान्‌ कहा गया है। अधिक धन के व्यय से होने वाले हजारों धर्म हैं ॥ ६५ ॥

पुरुषोत्तम मास में थोड़े धन से महान्‌ धर्म होता है। स्नान, दान और कथा में विष्णु भगवान्‌ का स्मरण करना ॥ ६६ ॥

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