अध्याय २०

इतना भी उत्तम धर्म यदि किया जाय तो वह महान्‌ भय से रक्षा करता है ॥ ६७ ॥

जिस प्रकार गंगा ही तीर्थ हैं, कामदेव ही धनुषधारी हैं, विद्या ही धन है और गुण ही रूप है उसी तरह संपूर्ण महीनों में उत्तम पुरुषोत्तम मास साक्षात्‌ पुरुषोत्तम ही हैं ॥ ६८ ॥

यद्यपि यह पुरुषोत्तम मास प्रथम समस्त कार्यों में तथा यज्ञों में अत्यन्त निन्द्य था तो भी भगवान्‌ के प्रसाद से पृथिवी में साक्षात्‌ भगवान्‌ के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ६९ ॥

एतन्मात्रोऽपि सद्धर्मस्त्रायते महतो भयात्‌ ॥ ६७ ॥

गङ्गैव तीर्थं स्मर एक धन्वी वित्तं तु विद्यैव गुणास्तु रूपम्‌ ॥ मासेषु सर्वेषु तथैव साक्षान्मासोत्तमोऽयंपुरुषोत्तमो हि ॥ ६८ ॥

यद्यप्यसौ निन्द्यतमः पुराऽऽसीत्‌ सर्वेषु कृत्येषु मखादिकेषु ॥ तथापि साक्षाद्भगवत्प्रसादात्तन्नामनाम्नाभुवि विश्रुतोऽभूत्‌ ॥ ६९ ॥

यथा हस्तिपदे लीनं सर्वप्राणिपदं भवेत्‌ ॥ धर्माः कलास्तथा सर्वे विलीनाः पुरुषोत्तमे ॥ ७० ॥

यथाऽमरतरङ्गिण्या न समाः सकलापगाः ॥ कल्पवृक्षेण न समा यथा सकलपादपाः ॥ ७१ ॥

चिन्तारत्नेिन रत्नानि न समानि यथा भुवि ॥ कामधेन्वा यथा गावो न राजा पुरुषाः समाः ॥ ७२ ॥

जिस प्रकार हाथी के पैर में सब प्राणियों के पैर लीन हो जाते हैं उसी तरह समस्त धर्म और कला समस्त पुरुषोत्तम में विलीन हो जाते हैं ॥ ७० ॥

जिस प्रकार और-और नदियों की तुलना गंगा के समान नहीं की जा सकती। कल्पवृक्ष के समान अन्य समस्त वृक्ष नहीं कहे जा सकते ॥ ७१ ॥

चिन्तामणि के समान दूसरे रत्न पृथिवी में नहीं हो सकते। कामधेनु के समान दूसरी गौ नहीं हो सकती, राजा के समान दूसरे पुरुष नहीं हो सकते ॥ ७२ ॥

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