अध्याय २०

वेदों के समान समस्त शास्त्र नहीं होते, उसी प्रकार समस्त पुण्यकाल इस पुरुषोत्तम मास के पुण्यकाल के समान नहीं हो सकते ॥ ७३ ॥

पुरुषोत्तम मास के देवता पुरुषोत्तम भगवान्‌ हैं। इसलिये भक्ति और श्रद्धा से पुरुषोत्तम भगवान्‌ की पूजा करनी चाहिये ॥ ७४ ॥

शास्त्र को जाननेवाला, कुशल, शुद्ध, वैष्णव, सत्यवादी और विप्र आचार्य को बुलाकर उसके द्वारा पुरुषोत्तम की पूजा करे ॥ ७५ ॥

न वेदैः सर्वशास्त्राणि पुण्यकालास्तथाखिलाः ॥ पुरुषोत्तममासेन समो मासो न कर्हिचित्‌ ॥ ७३ ॥

पुरुषोत्तममासस्य दैवतं पुरुषोत्तमः ॥ तस्मात्सम्पूजयेद्भक्त्या  श्रद्धया पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ७४ ॥

शास्त्रज्ञं निपुणं शुद्धं वैष्णवं सत्यवादिनम्‌ ॥ विप्राचार्यमथाहूय पूजां तेन प्रकल्पयेत्‌ ॥ ७५ ॥

संसार-सागरमतीव-गभीर वेगमन्तःस्थ-मोह-मदनादि-तिमिङ्गिगिलौघम्‌ ॥ उल्ल ङ्घय गन्तुमभिवाञ्छति भारतेऽस्मिन्‌ सम्पूजयेत्‌ स पुरुषोत्तममादिदेवम्‌ ॥ ७६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढधन्वोपाख्याने आह्निककथनं नाम विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥

अन्तःकरण में होनेवाले मोह, काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य आदि रूप बड़ी-बड़ी मछलियों से पूर्ण, अत्यन्त गम्भीर वेगवाले इस संसाररूप सागर को पार करने की इच्छा करता है वह इस भारतवर्ष में आदिदेवता पुरुषोत्तम भगवान्‌ का अच्छी तरह पूजन करे ॥ ७६ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे दृढ़धन्वोपाख्याने आह्निककथनं नाम विंशतितमोऽध्यायः ॥ २० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13