अध्याय २०

मैंने पूर्वजन्म में सुदेव नामक ब्राह्मणश्रेष्ठ होकर विधि से पुरुषोत्तम मास का सेवन किया। जिसके प्रताप से मेरा मृत पुत्र उठ खड़ा हो गया ॥ ७ ॥

हे ब्रह्मन्‌! पुत्रशोक के कारण निरन्तर निराहारी मेरा यह पुरुषोत्तम मास बिना जाने ही बीत गया ॥ ८ ॥

अज्ञान से भये पुरुषोत्तम मास का ऐसा फल हुआ कि मृत्यु को प्राप्त भी शुकदेव उठ खड़ा हो गया। बाद हरि भगवान्‌ के कहने पर इस अनुभूत पुरुषोत्तम मास का सेवन किया ॥ ९ ॥

पूर्वजन्मन्यहं भूत्वा सुदेवो ब्राह्मणोत्तमः ॥ विधिना कृतवान्मासं दृष्ट्वा पुत्रं मृतोत्थितम्‌ ॥ ७ ॥

अजानतोऽपि मे ब्रह्मन्पुत्रशोकादचेतसः ॥ निराहारस्य सततं गतश्च पुरुषोत्तमः ॥ ८ ॥

तस्याप्येतत्फलं जातं शुकदेवो मृतोत्थितः ॥ अनुभूतमिमं मासं संसेवे हरिणोदितः ॥ ९ ॥

इह जन्मनि तत्सर्वं विस्मृतं मे तपोधन ॥ एतत्पूजाविधानं मे वद विस्तरतः पुनः ॥ १० ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय परब्रह्म विचिन्तवेत्‌ ॥ ततो व्रजेन्नैर्ऋताशां बृहत्सोदकभाजनः ॥ ११ ॥

ग्रामाद्‌दूरतरं गच्छेत्पुरुषोत्तमसेवकः ॥ दिवासन्ध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्रं उदङ्‌मुखः ॥ १२ ॥

हे तपोधन! मुझे इस जन्म में वह सब विस्मृत हो गया है। इसलिये इस पुरुषोत्तम मास का पूजन विधान विस्तार पूर्वक मुझसे फिर कहिये ॥ १० ॥

बाल्मीकि जी बोले – ब्राह्म मुहूर्त में उठकर परब्रह्म का चिन्तन करे उसके बाद बड़े पात्र में जल लेकर नैर्ऋत्य दिशा में जाय ॥ ११ ॥

पुरुषोत्तम मास को सेवन करने वाला शौच के लिये ग्राम से बहुत दूर जाय। दिन में तथा सन्ध्या में कान पर जनेऊ को रख कर और उत्तरमुख होकर ॥ १२ ॥

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