अध्याय २०

पृथिवी को तृण से आच्छादित कर वस्त्र से शिर बाँध कर और मुख को बन्द कर अर्थात्‌ मौन होकर रहे, न थूके और न श्वाँस ले ॥ १३ ॥

इस तरह मल-मूत्र का त्याग करे। और यदि रात्रि हो तो दक्षिण मुख होकर मल-मूत्र का त्याग करे और मूत्रेन्द्रिय को पकड़ कर उठे। शुद्ध मिट्टी को ले ॥ १४ ॥

आलस्य छोड़कर दुर्गन्ध दूर करने के लिये मृत्तिका से शुद्धि करे। लिंग में एक बार, गुदा में पाँच बार, बायें हाथ में तीन बार, दोनों हाथों में दश बार मिट्टी लगावे ॥ १५ ॥

अन्तर्धाय तृणैर्भूमि शिरः प्रावृत्य वाससा ॥ वक्त्रंे नियम्य यत्नेथन नो ष्ठीवेन्नोच्छ्‌वसेदपि ॥ १३ ॥

कुर्यान्मूत्रपुरीषं च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः ॥ गृहीतशिश्न श्चोत्थाय गृहीतशुचिमृत्तिकः ॥ १४ ॥

गन्धलेपक्षयकरं कुर्याच्छौचमतन्द्रितः ॥ एका लिङ्गे गुदे पञ्च त्रिर्वामें दश चोभयोः ॥ १५ ॥

द्विसप्त पादयोश्चैव गार्हस्थ्यं शौचमुच्यते ॥ कृत्वा शौचं तु प्रक्षाल्य पादौ हस्तौ च मृज्जशलैः ॥ १६ ॥

तीर्थे शौचं न कुर्वीत कुर्वीतोद्धृतवारिणा ॥ अरत्नि द्वयसञ्चारि त्यक्त्वाप कुर्यादनुद्धृते ॥ १७ ॥

पश्चाेत्तच्छोधयेत्तीर्थमशुद्धमन्यथा हि तत्‌ ॥ एवं शौचं प्रकुर्वीत पुरुषोत्तमसद्‌व्रती ॥ १८ ॥

दोनों पैरों में १४ बार लगावे। यह गृहस्थाश्रमी को शौच कहा है। इस तरह शौच कर मिट्टी और जल से पैर और हाथ धोकर दूसरा कार्य करे ॥ १६ ॥

तीर्थ में शौच न करे। तीर्थ से जल निकाल कर शौच करे। दो हाथ जलवाले गढ़ई को छोड़ कर यदि अनुद्‌धृत जल में अर्थात्‌ तीर्थ में शौच करे ॥ १७ ॥

तो बाद तीर्थ की शुद्धि करे अन्यथा तीर्थ अशुद्ध हो जाता है। इस प्रकार पुरुषोत्तम का उत्तम व्रत करने वाला शौच करे ॥ १८ ॥

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