अध्याय २०

तदनन्तर सोलह कुल्ला अथवा बारह कुल्ला करे। मूत्र का त्याग करने के बाद आठ अथवा चार कुल्ला गृहस्थ करे ॥ १९ ॥

उठकर प्रथम नेत्रों को धो डाले। बाद दतुअन ले आवे और इस मन्त्र को अच्छी तरह कह कर दन्तधावन करे ॥ २० ॥

हे वनस्पते! आयु, बल, यश, वर्च, प्रजा, पशु, वसु, ब्रह्मज्ञान और मेधा को मेरे लिए दो ॥ २१ ॥

ततः षोडश गण्डूषान्प्रकुर्याद्‌द्वादशैव वा ॥ मूत्रोत्सर्गे तु गण्डूषानष्टौ वा चतुरो गृही ॥ १९ ॥

उत्थाय नेत्रे प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं समाहरेत्‌ ॥ इमं मन्त्रं समुच्चार्य दन्तधावनमाचरेत्‌ ॥ २० ॥

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ॥ ब्रह्मप्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥ २१ ॥

अपामार्गं बादरं वा द्वादशाङ्‌गुलमव्रणम्‌ ॥ कनिष्ठाङ्गुलिवत्स्थूलं पूर्वार्द्धकृतकूर्चकम्‌ ॥ २२ ॥

शुचिर्द्वादशगण्डूषैर्निषिद्धं भानुवासरे ॥ आचम्य प्रयतः सम्यक्‌ प्रातः स्नानं समाचरेत्‌ ॥ २३ ॥

स्नानादनन्तरं तावत्तर्पयेतीर्थदेवताः ॥ समुद्रगानदीस्नानमुत्तमं परिकीतितम्‌ ॥ २४ ॥

अपामार्ग अथवा बैर की बारह अंगुल की छेदरहित दँतुअन कानी अंगुली के समान सोटी हो जिसके पर्व के आधे भाग में कूची बनी हो उस दँतुअन से मुख शुद्धि करे ॥ २२ ॥

रविवार के दिन काष्ठ से दँतुअन करना मना किया है। इसलिये बारह कुल्ला  से मुखशुद्धि करे। बाद आचमन कर अच्छी तरह प्रातःकाल में स्नान करे ॥ २३ ॥

स्नान के बाद उसी समय तीर्थ के देवताओं को तर्पण के द्वारा जल देवे। और समुद्र में मिली हुई नदी में स्नान करना उत्तम कहा है ॥ २४ ॥

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