अध्याय २०

बावली कूप तालाब में स्नान करना विद्वानों ने मध्यम कहा है और गृहस्थ को गृह में स्नान करना सामान्य कहा है ॥ २५ ॥

स्नान के बाद शुद्ध और शुक्ल ऐसे दो वस्त्रों को धारण करे। ब्राह्मण कन्धे पर रखे जानेवाले उत्तरीय वस्त्र को सावधानी के साथ हमेशा धारण करे ॥ २६ ॥

पवित्र स्नान में पूर्व मुख अथवा उत्तर मुख होकर बैठे और शिखा बाँध कर दोनों जाँघों के अन्दर हाथों को रखे ॥ २७ ॥

वापीकूपतडागेषु मध्यमं कथितं बुधैः ॥ गृहे स्नानं तु सामान्यं गृहस्थस्य प्रकीर्त्तितम्‌ ॥ २५ ॥

ततश्च वाससी शुद्धे शुक्ले च परिधाय च ॥ उत्तरीयं सदा धार्यं ब्राह्मणेन विजानता ॥ २६ ॥

उपविश्य शुचौ देशे प्राङ्‌मुखो वा उदङ्‌मुखः ॥ भूत्वा बद्धशिखः कुर्यादन्तर्जानुभुजद्वयम्‌ ॥ २७ ॥

सपवित्रेण हस्तेन कुर्यादाचमनक्रियाम्‌ ॥ नोच्छिष्टं तत्पवित्रं तु भुक्त्वो्च्छिष्टं तु वर्जयेत्‌ ॥ २८ ॥

आचम्य तिलकं कुर्याद्गोपीचन्दनमृत्स्नया ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं दण्डाकारं प्रकल्पयेत्‌ ॥ २९ ॥

ऊर्ध्वपुण्ड्रं त्रिपुण्ड्रं वा मध्ये छिद्रं प्रकल्पयेत्‌ ॥ निवसत्यूर्ध्वपुण्ड्र तु श्रिया सह हरिः स्वयम्‌ ॥ ३० ॥

कुश की पवित्री हाथ में धारण कर आचमन क्रिया को करे। ऐसा करने से पवित्री अशुद्ध नहीं होती है। परन्तु भोजन करने से पवित्री अशुद्ध हो जाती है। इसलिये भिजन के बाद उस पवित्री का त्याग करे ॥ २८ ॥

आचमन के बाद गोपीचन्दन की मिट्टी से तिलक धारण करे। वह तिलक ऊर्ध्वपुण्ड्र हो, सीधा हो, सुन्दर हो, दण्ड के आकार का हो ऐसा धारण करे ॥ २९ ॥

ऊर्ध्वपुण्ड्र हो अथवा त्रिपुण्ड्र हो उसके मध्य में छिद्र बनावे। ऊर्ध्वपुण्ड्र में लक्ष्मी के साथ हरि भगवान्‌ स्वयं निवास करते हैं ॥ ३० ॥

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