अध्याय २०

त्रिपु्ण्ड्र में पार्वती सहित साक्षात्‌ शंकर भगवान्‌ सर्वदा वास करते हैं। बिना छिद्र का पुण्ड्र कुत्ते के पैर के समान विद्वानों ने कहा है ॥ ३१ ॥

सफेद तिलक ज्ञान को देनेवाला है, लाल तिलक मनुष्यों को वशीकरण करनेवाला कहा है, पीला समस्त ऋद्धि को देनेवाला कहा है। इससे भिन्न तिलक को नहीं लगावे ॥ ३२ ॥

गोपीचन्दन की मिट्टी से शंख, चक्र, गदा, पद्म आदि धारण करे। यह सम्पूर्ण पापों को नाश करने वाला और पूजा का अंग कहा गया है ॥ ३३ ॥

त्रिपुण्ड्रे धूर्जटिः साक्षादुमया सह सर्वदा ॥ विना छिद्रं तु तत्पुण्ड्रं शुनः पादसगं विदुः ॥ ३१ ॥

श्वेपतं ज्ञानकरं प्रोक्तं रक्तं वश्यकरं नृणाम्‌ ॥ पीतं सर्वर्द्धिदं प्रोक्तमन्यत्तु परिवर्जयेत्‌ ॥ ३२ ॥

शङ्खचक्रादिकं धार्यं गोपीचन्दनमृत्स्नया ॥ सर्वपापक्षयकरं पूजाङ्गं परिकीर्त्तितम्‌ ॥ ३३ ॥

शङ्खचक्रादिचिह्नानि दृश्यन्ते यस्य विग्रहे ॥ मर्त्यो मर्त्यो न विज्ञेयः स नित्यं भगवत्तनुः ॥ ३४ ॥

पापं सुकृतरूपं तु जायते तस्य देहिनः ॥ शङ्खचक्रादिचिह्नानि यो धारयति नित्यशः ॥ ३५ ॥

नारायणायुधैर्नित्यं चिह्नितो यस्य विग्रहः ॥ पापकोटियुतस्यापि तस्य किं कुरुते यमः ॥ ३६ ॥

जिसके शरीर में शंख चक्रादि भगवान्‌ के आयुधों का चिह्न देखने में आता है उस मनुष्य को, मनुष्य नहीं समझना। वह भगवान्‌ का शरीर है ॥ ३४ ॥

जो शंख चक्र आदि चिह्नों को नित्य धारन करता है, उस देही के पाप पुण्यरूप हो जाते हैं ॥ ३५ ॥

नारायण के आयुधों से जिसका शरीर चिह्नित रहता है उसका कोटि-कोटि पाप होने पर भी यमराज क्या कर सकता है? ॥ ३६ ॥

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