अध्याय २०

बाद प्राणायाम करके सन्ध्यावन्दन करे। प्रातःकाल की सन्ध्या विधिपूर्वक नक्षत्र के रहने पर करे ॥ ३७ ॥

जब तक सूर्यनारायण का दर्शन न हो तब तक गायत्री मन्त्र का जप करे और सूर्योपस्थान के मन्त्रों से उठकर अञ्जकलि बाँध कर उपस्थान करे ॥ ३८ ॥

सायंकाल के समय अपने पैर को पृथिवी में करके नमस्कार करे। यस्य स्मृत्या च नामोक्त्याम तपोयज्ञक्रियादि्षु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्‌ ॥ जो कमी रह गई हो उसको इस मन्त्र से पूर्ण करे ॥ ३९ ॥

प्राणायामं ततः कृत्वा सन्ध्यावन्दनमाचरेत्‌ ॥ पूर्वसन्ध्यां सनक्षत्रामुपासीत यथाविधि ॥ ३७ ॥

गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावदादित्यदर्शनम्‌ ॥ सावित्रैरनघैर्मन्त्रैरुपस्थाय कृताञ्जलिः ॥ ३८ ॥

आत्मपादौ तथा भूमौ सन्ध्याकालेऽभिवादयेत्‌ ॥ यस्य स्मृत्येति मन्त्रेण यदूनं परिपूरयेत ॥ ३९ ॥

यस्तु संध्यामुपासीत श्रद्धया विधिवद्‌द्विजः ॥ न तस्य किञ्चिद्‌दुष्प्रापं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ ४० ॥

दिवसस्यादिमे भागे कृत्यमेतदुदीरितम्‌ ॥ एवं कृत्वा क्रियां नित्यं हरिपूजां समाचरेत्‌ ॥ ४१ ॥

उपलिप्तेद शुचौ देशे नियतो वाग्यतः शुचिः ॥ वृत्तं वा चतुरस्रं पा मण्डलं गोमयेन तु ॥ ४२ ॥

जो द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) श्रद्धा के साथ सन्ध्या करता है उसको तीनों लोक में कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं है ॥ ४० ॥

दिन के आदि भाग (प्रातःकाल) में होने वाले कृत्य को कहा! इस प्रकार प्रातःकाल की नित्य क्रिया को करके हरि भगवान्‌ की पूजा को करे ॥ ४१ ॥

लीपे हुए शुद्ध स्थान में नियम में स्थित होकर और मौन तथा पवित्र होकर गोबर से गोल अथवा चौकोर मण्डल को ॥ ४२ ॥

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