अध्याय २०

बना कर व्रत की सिद्धि के लिये चावलों से अष्टदल कमल बनावे। बाद सुवर्ण, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टी का मजबूत और नवीन ॥ ४३ ॥

छिद्र रहित शुद्ध कलश को उस मण्डल के ऊपर स्थापित करे और उस कलश में शुद्ध तीर्थों से लाये हुए कल्याणप्रद जल को भर कर ॥ ४४ ॥

कलश के मुख में विष्णु, कण्ठ में रुद्र भगवान्‌ अच्छी तरह वास करते हैं। उसके मूल में ब्रह्मा जी स्थित रहते हैं, मध्य भाग में मातृगण कहे गये हैं ॥ ४५ ॥

विधायाष्टदलं कुर्यात्तण्डुलैर्व्रतसिद्धये ॥ सौवर्णं राजतं ताम्रं मृन्मयं सुडृढं नवम्‌ ॥ ४३ ॥

अव्रणं कलशं शुद्धं स्थापयेन्मण्डलोपरि ॥ तत्रोदकं समापूर्य शुद्धतीर्थाहृतं शिवम्‌ ॥ ४४ ॥

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ॥ मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥ ४५ ॥

कुक्षो तु सागराः सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा ॥ ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥ ४६ ॥

अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ॥ एवं संस्थाप्य कलशं तत्र तीर्थानि योजयेत्‌ ॥ ४७ ॥

गङ्गा गोदावरी चैव कावेरी च सरस्वती ॥ आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः ॥ ४८ ॥

कोख में समस्त समुद्र और सात द्वीप वाली वसुन्धरा, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वण वेद ॥ ४६ ॥

व्याकरण आदि अंगों के साथ सब कलश में स्थित हों। इस प्रकार कलश को स्थापित करके उसमें तीर्थों का आवाहन करे ॥ ४७ ॥

गंगा, गोदावरी, कावेरी और सरस्वती मेरी शान्ति के लिये तथा पापों के नाश करने के हेतु आवें ॥ ४८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13