अध्याय २०

तदनन्तर उस कलश का मन्त्रपाठ पूर्वक गन्ध, अक्षत, नैवेद्य और उस काल में होने वाले पुष्प आदि उपचारों से पूजन करके ॥ ४९ ॥

उसके ऊपर पीले वस्त्र से लपेटा हुआ ताँबे का पात्र स्थापित करे। उस पात्र के ऊपर राधा के साथ हरि की मूर्ति को स्थापित करे ॥ ५० ॥

राधा के सहित सुवर्ण की पुरुषोत्तम भगवान्‌ की प्रतिमा बनावे और भक्ति में तत्पर होकर विधि के साथ उस प्रतिमा की पूजा करे ॥ ५१ ॥

ततः सम्पूज्य कलशमुपचारैः समन्त्रकैः ॥ गन्धाक्षतैश्च नैवेद्यैः पुष्पैस्तत्कालसम्भवैः ॥ ४९ ॥

तस्योपरि न्यसेत्पात्रं ताम्रं पीताम्बरावृतम्‌ ॥ तस्योपरि न्यसेद्धैमं राधया सहितं हरिम्‌ ॥ ५० ॥

राधया सहितः कार्यः सौवर्णः पुरुषोत्तमः ॥ तस्य पूजा प्रकर्तव्या विधिना भक्तितत्परैः ॥ ५१ ॥

पुरुषोत्तममासस्य दैवतं पुरुषोत्तमः ॥ तस्य पूजा प्रकर्त्तव्या सम्प्राप्ते् पुरुषोत्तमे ॥ ५२ ॥

संसारसागरे मग्नमुत्तारयति यो ध्रुवम्‌ ॥ को न सेवेत तं लोके मर्त्यो मरणधर्मवान्‌ ॥ ५३ ॥

पुनर्ग्रामाः पुनर्वित्तं पुनः पुत्राः पुनर्गृहम्‌ ॥ पुनः शुभाशुभं कर्म न शरीरं पुनः पुनः ॥ ५४ ॥

पुरुषोत्तम मास के पुरुषोत्तम देवता हैं। पुरुषोत्तम मास के आने पर उनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ५२ ॥

जो इस संसारसागर में डूबे हुये को उबारता है उसकी इस लोक में भी मृत्यु धर्म वाला कौन मनुष्य पूजा नहीं करता है? ॥ ५३ ॥

ग्राम फिर मिलते हैं, धन फिर मिलता है, पुत्र फिर मिलते हैं, गृह फिर मिलता है, शुभ-अशुभ कर्म फिर मिलते हैं, परन्तु शरीर फिर-फिर नहीं मिलता है। ॥ ५४ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13