अध्याय २१

बाल्मीकि मुनि बोले – इसके बाद फिर प्रतिभा की अनलोत्तारण क्रिया करके प्राणप्रतिष्ठा करे। अन्यथा यदि प्राणप्रतिष्ठा नहीं करता है तो वह प्रतिमा धातु ही कही जायगी अर्थात्‌ उसमें देवता का अंश नहीं होता है ॥ १ ॥

दाहिने हाथ से प्रतिमा के दोनों कपालों का स्पर्श कर हरि भगवान्‌ की उस प्रतिमा में प्राणप्रतिष्ठा अवश्य करे ॥ २ ॥

प्रतिमाओं में प्राणों की प्रतिष्ठा न करने से सुवर्ण आदि का भाग पूर्व के समान ही रहता है उनमें देवता वास नहीं करते हैं ॥ ३ ॥

बालमीकिरुवाच ॥ अनलोत्तारणं कृत्वा प्रतिमायास्ततः परम्‌ ॥ प्राणप्रतिष्ठां कुर्वीत ह्यन्यथा धातुरेव सा ॥ १ ॥

प्रतिमायाः कपोलौ द्वौ स्पृष्ट्वा दक्षिणपाणिना ॥ प्राणप्रतिष्ठां कुर्वीत तस्यां देवस्य वै हरेः ॥ २ ॥

अकृतायां प्रतिष्ठायां प्राणानां प्रतिमासु च ॥ यथा पूर्वं तथा भागः स्वर्णादीनां न देवता ॥ ३ ॥

अन्येषामपि देवानां प्रतिमास्वपि पार्थिव ॥ प्राणप्रतिष्ठा कर्तव्या तस्यां देवत्वसिद्धये ॥ ४ ॥

पुरुषोत्तमबीजेन तद्विष्णोरित्यनेन च ॥ तथैव हृदयेऽङ्गुष्ठं दत्त्वा शश्वच्च मन्त्रवित्‌ ॥ ५ ॥

एभिर्मन्त्रैः प्रतिष्ठां हृदयेऽपि समाचरेत्‌ ॥ अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ॥ ६ ॥

हे पार्थिव! दूसरे देवताओं की प्रतिमा में भी देवत्वसिद्धि के लिये प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिये ॥ ४ ॥

पुरुषोत्तम भगवान्‌ के बीजमन्त्र से और “तद्विष्णोः परमम्पदँ सदा” इस मन्त्र से करना चाहिये, मन्त्रवेत्ता उसी प्रकार प्रतिमा के हृदय पर अंगुष्ठ निरन्तर रख कर ॥ ५ ॥

हृदय में भी इन मन्त्रों से प्राणप्रतिष्ठा को करे। इस प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित हों, इस प्रतिमा में प्राण चलायमान हों ॥ ६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9