अध्याय २१

इस प्रतिमा की पूजा के लिये देवत्व प्राप्त हो स्वाहा, इस तरह यजुर्मन्त्र को कहता हुआ मूलमन्त्रों से, अंगमन्त्रों से, वैदिकमन्त्रों से ॥ ७ ॥

सर्वत्र प्रतिमाओं में प्राणप्रतिष्ठा को करे अथवा अच्छी तरह चतुर्थ्यन्त नाम मन्त्रों से ॥ ८ ॥

स्वाहा पद अन्त में जोड़ कर तत्तद्‌ देवताओं का अनुस्मरण करता हुआ प्राणप्रतिष्ठा को करे। इस प्रकार प्राणों की प्रतिष्ठा करके श्रीपुरुषोत्तम का ध्यान करे ॥ ९ ॥

अस्यै देवत्वमर्चायै स्वाहेति यजुरीरयन्‌ ॥ मूलमन्त्रैरङ्गमन्त्रैर्वैदिकैरित्यनेन च ॥ ७ ॥

प्राणप्रतिष्ठां सर्वत्र प्रतिमासु समाचरेत्‌ ॥ अथवा नाममस्त्रैश्च चतुर्थ्यन्तैः प्रयत्नतः ॥ ८ ॥

स्वाहान्तैश्च प्रकुर्वीत तत्तद्देवाननुस्मरन्‌ ॥एवं प्राणान्‌ प्रतिष्ठाय ध्यायेच्छ्रीपुरुषोत्तमम्‌ ॥ ९ ॥

श्रीवत्सवक्षसं शान्तं नीलोत्पलदलच्छविम्‌ ॥ त्रिभङ्गललितं ध्यायेत्‌ स-राधं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १० ॥

देशकालौ समुल्लिख्य नियतो वाग्यतः शुचिः ॥ षोडशैरुपचारैश्च पूजयेत्‌ पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ११ ॥

आगच्छ देव देवेश श्रीकृ्ष्ण पुरुषोत्तम ॥ राधया सहितश्चात्र गृहाण पूजनं मम ॥ १२ ॥

श्रीवत्स चिह्न से चिह्नित वक्षःस्थल वाले, शान्त, नील कमल के दल के समान छविवाले, तीन जगहों से टेढ़ी आकृति होने से सुन्दर, राधा के सहित पुरुषोत्तम भगवान्‌ का ध्यान करे ॥ १० ॥

देश काल को कह कर अर्थात्‌ संकल्प करके, नियम में स्थित होकर, मौन होकर, पवित्र होकर, षोडशोपचार से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजन करे ॥ ११ ॥

हे देव! हे देवेश! हे श्रीकृष्ण! हे पुरुषोत्तम! राधा के साथ आप यहाँ मुझसे दिये हुए पूजन को ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥

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