अध्याय २१

हे राधिका के आनन्द दाता! दूध, दही, गौ का घृत, शहद और चीनी, इन द्रव्यों को ग्रहण करें। यह कह कर पंचामृत से स्नान समर्पण करे ॥ १८ ॥

हे नाथ! योगेश्वर, देव, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले, यज्ञों के स्वामी गोविन्द भगवान्‌ को नमस्कार है ॥ १९ ॥

हे कृष्ण! गंगाजल के समान नदी तीर्थ का मेरे से दिया गया यह जल है। नन्द का आनन्द देनेवाले! आप इसको ग्रहण करें। यह कहकर फिर स्नान समर्पण करे ॥ २० ॥

इति स्नानम्‌ ॥ पयो दधि घृतं गव्यं माक्षिकं शर्करा तथा गृहाणेमानि द्रव्याणि राधिकानन्ददायक ॥ १८ ॥

इति पञ्चामृतस्नानम्‌ ॥ योगेश्व्राय देवाय गोवर्धनधराय च ॥ यज्ञानां पतये नाथ गोविन्दाय नमो नमः ॥ १९ ॥

गङ्गाजलसमं शीतं नदीतीर्थसमुद्भवम्‌ ॥ स्नानं दत्तं मया कृष्ण गृह्यतां नन्दनन्दन ॥ २० ॥

इति पुनः स्नानम्‌ ॥ पीताम्बरयुगं देव सर्वकामार्थसिद्धये ॥ मया निवेदितं भक्त्या गृहाण सुरसत्तम ॥ २१ ॥

इति वस्त्रम्‌ ॥ आचमनम्‌ ॥ दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात्‌ ॥ ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥

उपवीतम्‌ ॥ आचमनम्‌ ॥ श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरम्‌ ॥ विलेपनं सुरश्रेष्ठ प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ २३ ॥

हे देव! समस्त कार्यों की सिद्धि के लिये इन दो पीताम्बरों को भक्ति के साथ मैंने निवेदन किया है। हे सुरसत्तम! आप ग्रहण करें। यह कह कर वस्त्र समर्पण करे और वस्त्र धारण के बाद आचमन देवे ॥ २१ ॥

हे दामोदर! आपको नमस्कार है, इस भवसागर से मेरी रक्षा करें। हे पुरुषोत्तम! उत्तरीय वस्त्र के साथ जनेऊ को आप ग्रहण करें। यह कह कर जनेऊ समर्पण करे और आचमन देवे ॥ २२ ॥

हे सुरश्रेष्ठ! अत्यन्त मनोहर सुगन्धित, दिव्य, श्रीखण्ड चन्दन विलेपन आपके लिये है इसको ग्रहण करें। यह कहकर चन्दन समर्पण करे ॥ २३ ॥

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