अध्याय २१

हे सुरश्रेष्ठ! केशर से रंगे हुए शोभमान अक्षतों को भक्ति से मैंने निवेदन किया है, हे पुरुषोत्तम! आप ग्रहण करें। यह कहकर अक्षत समर्पण करे ॥ २४ ॥

हे प्रभो! मैं मालती आदि सुगन्धित पुष्पों को आपके पूजन के लिये लाया हूँ। आप इनको ग्रहण करें। यह कह कर पुष्प समर्पण करे ॥ २५ ॥

बाद अंगों का पूजन करे। नंद-यशोदा के पुत्र, केशि दैत्य को मारने वाले, पृथ्वी के भार को उतारने वाले, अनन्त विष्णुरूप धारण करने वाले ॥ २६ ॥

चन्दनम्‌ ॥ अक्षतास्तु सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ताः सुशोभिताः ॥ मया निवेदिता भक्त्या गृहाण पुरुषोत्तम ॥ २४ ॥

इत्यक्षतान्‌ ॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो ॥ मयाऽऽहृतानि पूजार्थं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ २५ ॥

इति पुष्पाणि ॥ ततोऽङ्गपूजा ॥ नन्दात्मजो यशोदायास्तनयः केशिसूदनः ॥ भूभारोत्तारकश्चैथव ह्यनन्तो विष्णुरूपधृक्‌ ॥ २६ ॥

प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च श्रीकण्ठः सकलास्त्रधृक्‌ ॥ वाचस्पतिः केशवश्च सर्वात्मेति च नामतः ॥ २७ ॥

पादौ गुल्फौ तथा जानू जघने च कटी तथा ॥ मेढ्रं नाभिं च हृदयं कण्ठं बाहू मुखं तथा॥ २८ ॥

नेत्रे शिरश्च सर्वाङ्गं विश्व्रूपिणमर्चयेत्‌ ॥ पुष्पाण्यादाय क्रमशश्चतुर्थ्यन्तैर्जगत्पतिम्‌ ॥ २९ ॥

प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, श्रीकण्ठ, सकलास्त्रधृक, वाचस्पति, केशव और सर्वात्मा, इन नामों से ॥ २७ ॥

पैर, गुल्फ, जानु, जघन, कटी, मेढ्‌, नाभि, हृदय, कण्ठ, बाहु और मुख ॥ २८ ॥

नेत्र, शिर और सर्वांग का पुष्पों को हाथों में लेकर चतुर्थ्यन्त नामों को कह कर विश्व,रूपी जगत्पति भगवान्‌ का पूजन करे ॥ २९ ॥

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