अध्याय २१

इस प्रकार प्रत्यंग का पूजन कर फिर चतुर्थ्यन्त केशवादि नाममन्त्रों से ॥ ३० ॥

एक-एक पुष्प हाथ में लेकर पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजन करे ॥ ३१ ॥

दिव्य वनस्पतियों के रस से बना हुआ, गन्ध से युक्त, उत्तम गन्ध, समस्त देवताओं के सूँघने के योग्य यह धूप है, इसको आप ग्रहण करें यह कहकर धूप समर्पण करे ॥ ३२ ॥

प्रत्यङ्गपूजां कृत्वा तु पुनश्च केशवादिभिः ॥ चतुविंशतिमन्त्रैश्च चतुर्थ्यन्तैश्च  नामभिः ॥ ३० ॥

पुष्पमादाय प्रत्येकं पूजयेत्‌ पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ३१ ॥

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढयो गन्ध उत्तमः ॥ आघ्रेयः सर्वदेवानांधूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ ३२ ॥

इति धूपम्‌ ॥ त्वं ज्योतिः सर्व देवानां तेजसां तेज उत्तमम्‌ ॥ आत्मज्योति परं धाम दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ ३३ ॥

इति दीपम्‌ ॥ नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ॥ ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम्‌ ॥ ३४ ॥

इति नैवेद्यम्‌ मध्ये पानीयम्‌ ॥ उत्तरापोशनम्‌ ॥ गगङ्गाजलं समानीतं सुवर्णकलशे स्थितम्‌ ॥ आचम्यतां हृषीकेश त्रैलोक्यव्याधिनाशन ॥ ३५ ॥

हे भगवन्‌! आप समस्त देवताओं के ज्योति हैं, तेजों में उत्तम तेज हैं, आत्मज्योति के परमधाम यह दीप आप ग्रहण करें। यह कहकर दीप समर्पण करे ॥ ३३ ॥

हे देव! नैवेद्य को ग्रहण करें और मेरी भक्ति को अचल करें। इच्छानुकूल वर को देवें और परलोक में उत्तम गति को देवें। यह कह कर नैवेद्य समर्पण करे। मध्य में जल समर्पण करे। आखिर में आचमन जल को देवें ॥ ३४ ॥

हे हृषीकेश! हे त्रैलोक्य के व्याधियों को शमन करने वाले! अच्छी तरह से सुवर्ण के कलश में गंगाजल को लाया हूँ, इस जल से आप आचमन करें। यह कहकर आचमन देवे ॥ ३५ ॥

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