अध्याय २१

हे देव! मैंने इस फल को आपके सामने स्थापित किया है, इसलिये मेरे को जन्म-जन्म में सुन्दर फलों की प्राप्ति हो। यह कहकर श्रीफल (बेल) समर्पण करे ॥ ३६ ॥

हे देव! हे परमेश्वलर! गन्ध कपूर से युक्त, कस्तूरी आदि से सुवासित इस करोद्वर्तन (हाथ की शुद्धि के लिये उबटन) को ग्रहण करे। यह कहकर करोद्वर्तन समर्पण करे ॥ ३७ ॥

हे देव! सुपारी से युक्त कर्पूर सहित, मनोहर, भक्ति से दिये गये इस ताम्बूल को ग्रहण करें। यह कहकर ताम्बूल समर्पण करे ॥ ३८ ॥

इत्याचमनम्‌ ॥ इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ॥ तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥ ३६ ॥

इति श्रीफलम्‌ ॥ गन्धकर्पूरसंयुक्तंथ कस्तूर्यादिसुवासितम्‌ ॥ करोद्वर्तनकंदेव गृहाण परमेश्वहर ॥ ३७ ॥

इति करोद्वर्तनम्‌ ॥ पूगीफलसमायुक्तंं सकर्पूरं मनोहरम्‌ ॥ भक्त्या दत्तं मया देव ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ ३८ ॥

इति ताम्बूलम्‌ ॥ हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ॥ अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ ३९ ॥

इति दक्षिणाम्‌ ॥ शारदेन्दीवरश्यामं त्रिभङ्गललिताकृतिम्‌ ॥ नीराजयामि देवेशं राधया सहितं हरिम्‌ ॥ ४० ॥

इति नीराजनम्‌ ॥ रक्ष रक्ष जगन्नाथ रक्ष त्रैलोक्यनायक ॥ भक्तानुग्रहकर्त्ता त्वं गृहाणेमां प्रदक्षिणाम्‌ ॥ ४१ ॥

ब्रह्मा के गर्भ में स्थित, अग्नि के बीज, अनन्त पुण्य के फल को देने वाला सुवर्ण आप ग्रहण करें और मेरे लिये शान्ति को देवें। यह कहकर दक्षिणा समर्पण करे ॥ ३९ ॥

शरत्‌ काल में होने वाले कमल के समान श्याम, तीन जगहों से टेढ़े होने से सुन्दर आकृति वाले, देवेश, राधिका के सहित हरि भगवान्‌ की आरती करता हूँ। यह कह कर नीराजन समर्पण करे ॥ ४० ॥

हे जगन्नाथ! रक्षा करो, रक्षा करो। हे त्रैलोक्य के नायक! रक्षा करो। आप भक्तों पर कृपा करने वाले हों। मेरी प्रदक्षिणा को ग्रहण करें। ऐसा कह कर प्रदक्षिणा समर्पण करे ॥ ४१ ॥

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